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नया साल खुशियां मनाने का नहीं, पीछले गुजरे वक्त पर गौरो-फिक्र करने का वक्त है

Happy New Year in Islam?

नया साल खुशियां मनाने का नहीं,
पीछले गुजरे वक्त पर गौरो-फिक्र करने का वक्त है

अगर हम गौर करें तो हर नया साल हमारे लिए खुशियां नहीं बल्के कुछ पैगामात लेकर आता है हर गुज़रे हुए साल के साथ हम सबके बहुत ही अज़ीज़ इंसान किसी की माँ किसी का बाप किसी का भाई या किसी की बहन या कोई बहुत ही करीबी रिश्तेदार या दोस्त इस दुनिया से हमेशा के लिये रुख़सत हो जाते हैं और जाते जाते हमे ये पैगाम दे जाते है कि हम सबके पास वक़्त बहुत कम है.

नये साल की खुशियां मनाने की जगह हम अपने गुज़रे हुए सालों का मुहासबा करें "तुम में से हर कोई देख ले कि उसने कल (आखिरत) के लिए क्या भेजा है" क़ुरआन

और सोचे की क्या हमारे अमल ऐसे रहे हैं कि हम पुराने साल को भूल कर नये साल का जश्न मनाते फिरे अगर नहीं है तो फिर शैतान के बहलावे में आकर अपनी आखिरत न बर्बाद करें शैतान तो है ही इंसान का खुला दुश्मन ( कुरान) और शैतान तो चाहता ही है कि ईमान वालों मे फहाशी को आम कर दे ( क़ुरआन )

किसी मुसलमान के लिए हकीकी खुशी का दिन उस दिन होगा, जब वह जहन्नुम से बच जाए और जन्नत में दाखिल कर दिया जाए.

इसी लिए हमको चाहिए कि शैतान के मक्र व फरेब से होशियार रहें और खुदा की इताअत और फरमाबरदारी में अपनी पूरी जिंदगी गुज़ारने की कोशिशे करें. अल्लाह हम सबको अमल की तौफीक अता
फरमाए.

➖ रफीक शेख, सुरत

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माँगने वाले को नरमी से जवाब देना

कुरआन में अल्लाह तआला फर्माता है : 

"माँगने वाले को नरमी से जवाब देना और उस को माफ कर देना उस सदके और ख़ैरात से बेहतर है, जिस के बाद तकलीफ पहुँचाई जाए, (याद रहे) अल्लाह तआला बड़ा बे नियाज और ग़ैरतमन्द है।"

📕 सूरह बकरा : २६३

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शराबी की सज़ा

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया : 

"जिस ने शराबनोशी की, अल्लाह तआला चालीस रात तक उस से खुश नहीं होगा। अगर वह (उसी हाल में) मर गया तो कुफ्र की हालत में मरेगा और अगर तौबा कर ली तो अल्लाह तआला उस की तौबा क़बूल फ़र्माएगा और अगर फिर शराब पी तो अल्लाह तआला उस को दोज़खियों का पीप पिलाएगा।"

📕 मुस्नदे अहमद : २७०५६

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शहीद कौन कौन लोग हैं

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:

"पाँच लोग शहीद हैं। ताऊन में मरने वाला, पेट की बीमारी में मरने वाला, डूब कर मरने वाला, दीवार वग़ैरा के गिरने से मरने वाला और राहे ख़ुदा में कत्ल होने वाला।"

📕 बुखारी: ६५३ अन अबी हुरैरा (र.अ)

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जुमा के लिये खास लिबास पहनना

“रसूलुल्लाह (ﷺ) के पास दो कपड़े थे, जिसे आप जुमा के दिन पहनते थे फिर जब वापस तशरीफ लाते तो उसे लपेट कर रख देते।”

📕 अल मतालिबुल आलिया : ७४५

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सिला रहमी करना

कुरआन में अल्लाह तआला फर्माता है: 

"जो लोग अल्लाह के अहद को तोड़ते हैं, उस को मजबूत कर लेने के बाद और उन तअल्लुक़ात को तोड़ते हैं, जिन के जोड़ने का अल्लाह तआला ने हुक्म दिया है और जमीन में फसाद मचाते हैं, यही लोग नुकसान उठाने वाले हैं।"

📕 सूरह बकरा : २७

फायदा: रिश्ते, नाते और तअल्लुक़ात को बरकरार (सिला रहमी करना) रखना और उस को खत्म न करना बहुत जरूरी है।

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पहाड़ों में पानी का जखीरा

पहाड़ों में भी अल्लाह तआला की अजीब व गरीब कुदरत कारफ़र्मा है,

जब बारिश होती है तो पहाड़ों में पानी के जखीरे जमा हो जाते हैं, फिर थोड़ा थोड़ा कर के चश्मों, नहरों की शक्ल में पानी बहता है, इस तरह जमीन के दूर दराज के मक़ामात तक को सैराब करता है, बाज़ पहाड़ों पर बर्फ की शक्ल में पानी महफूज हो जाता है, जो सूरज की गरमी से बकद्रे जरूरत थोड़ा थोड़ा पिघल कर नदियों, नालों और नहरों में जाकर जमीन वगैरा को सैराब करता है और कहीं कहीं पहाड़ों पर बड़े बड़े हौज़ भी होते हैं, जिस में पानी स्टाक रहता है। यह अल्लाह का कितना बड़ा निज़ाम है। 

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:
"जमीन में मानने वालों और यकीन करने वालों के लिये बहुत सी निशानियाँ हैं।"
[सूरह जारियात २०]

📕 अल्लाह की कुदरत

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इश्क क्या है?

इश्क क्या है?

एक आलिम से पूछा गया इश्क क्या है? तो आलिम ने जवाब में कहा:

"ये इश्क़ वो बीमारी है उन दिलों की जो अल्लाह के ज़िक्र से गाफ़िल हो गए है तो अल्लाह तआला ने सज़ा के तौर पे उनको अपने इलावा किसी और मखलुख का गुलाम बना दिया है।"

📕 बुजुर्गाने दींन के अक़वाल

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इस्लाम की दावत को ठुकराना एक बड़ा जुल्म

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

"उस शख्स से बड़ा ज़ालिम कौन होगा, जो अल्लाह पर झूट बाँधे, जब के उसे इस्लाम की दावत दी जा रही हो और अल्लाह ऐसे जालिमों को हिदायत नहीं दिया करता।"

📕 सूरह सफ्फ ७

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मदीना के कबाइल से हुजूर (ﷺ) का मुआहदा

मदीना तय्यिबा में मुख्तलिफ नस्ल व मज़हब के लोग रहते थे, कुफ्फार व मुश्रिकीन के साथ यहुद भी एक लम्बे जमाने से आबाद थे। रसूलुल्लाह (ﷺ) ने मदीना पहुँचने के बाद हिजरत के पहले ही साल मुसलमानों और यहूदियों के दर्मियान बाहमी तअल्लुकात ख़ुशगवार रखने के लिये एक बैनल अक्रवामी मुआहदा फर्माया। ताके नसल व मजहब के इख्तिलाफ के बावजूद कौमी यकजेहती और इत्तेहाद व इत्तेफाक कायम रहे और हर एक को एक दूसरे से मदद मिलती रहे।

यह मुआहदा हुकूके इन्सानी की सच्ची तस्वीर थी, तमाम लोगों को पूरे तौर पर मज़हबी आजादी हासिल थी, शहर में अमन व अमान और अद्ल व इन्साफ कायम करने और जुल्म व सितम को जड़ से ख़त्म करने का एक कामिल व मुकम्मल कानून था, बल्के इस को दुनिया का क़दीम तरीन बाकायदा "तहरीरी दस्तूर" कहा जा सकता है जो मुकम्मल शक्ल में आज भी मौजूद है। इस मुआहदे पर मदीना और उस के आस पास रहने वाले कबाइल से दस्तख़त भी लिये गए थे।

📕 इस्लामी तारीख

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पसंद के मुताबिक हदिया देना

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

"जो आदमी अपने मुसलमान भाई से किसी ऐसी चीज़ के साथ मुलाकात करे जिस से वह खुश होता हो, तो अल्लाह तआला उस को कयामत के दिन खुश कर देगा।

📕 तबरानी सगीर : ११७५

वजाहत: हदीस से मालूम हुआ के किसी दीनी भाई के यहाँ जाते वक़्त उस की पसंद के मुताबिक़ कोई चीज़ पेश करना चाहिये इस से अल्लाह की रजा व खुश्नूदी हासिल होती है।

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ख़ुशहाली आम होने की खबर देना

हजरत अदी (र.अ) फर्माते हैं के मुझ से रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

“अगर तेरी उम्र जियादा होगी तो तू देखेगा के आदमी मिट्टी भर सोना और चाँदी खैरात के लिये लाएगा और मोहताज को तलाश करेगा, लेकिन उसे कोई (सद्का) लेने वाला नहीं मिलेगा।”

📕 बुखारी: ३५१५

वजाहत: उलमा ने लिखा है के हजरत अदी बिन हातिम (र.अ) की उम्र १२० साल हुई और यह पेशीनगोई हज़रत उमर बिन अब्दुल अजीज (र.) के जमाने में पूरी हुई के ज़कात लेने वाला कोई मोहताज व मुफलिस नहीं मिलता था।

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गुस्ल में पूरे बदन पर पानी बहाना

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

"(जिस्म) के हर बाल के नीचे नापाकी होती है,
लिहाजा तुम बालों को धोओ
और बदन को अच्छी तरह साफ करो।"

📕 तिर्मिज़ी: १०६

खुलासा: गुस्ल में पूरे बदन पर पानी पहुँचाना फर्ज है।

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जन्नत के दरख्तों की सुरीली आवाज़

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:

"जन्नत में एक दरख्त है, जिसकी जड़ें सोने की और उनकी शाखें हीरे के जवाहरात की हैं, उस दरख्त से एक हवा चलती है, तो ऐसी सुरीली आवाज़ निकलती है, जिस से अच्छी आवाज़ सुनने वालों ने आज तक नहीं सुनी।"

📕 तरगिब : ५३२२, अन अबी हुरैरा (र.अ)

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दुआए जिब्रईल से इलाज

हजरत आयशा (र.अ) बयान करती है के जब रसूलुल्लाह (ﷺ) बीमार हुए,
तो जिब्रईल ने इस दुआ को पढ़ कर दम किया:

[ " اللہ کے نام سے ، وہ آپ کو بچائے اور ہر بیماری سے شفا دے اور حسد کرنے والے کے شر سے جب وہ حسد کرے اورنظر لگانے والی ہر آنکھ کے شرسے ( آپ کومحفوظ رکھے ۔ ) " ]

तर्जुमा: "अल्लाह के नाम पर, वह आपको बचाये और आपको हर बीमारी और हसद की बुराई से, जब वह हसद करता है और हर आंख की बुराई से (जो आपको महफूज़ रखे)।"

📕 मुस्लिम: ५६९९

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खाने में बरकत बीच में उतरती है

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

"बरकत खाने के बीच में उतरती है,
तुम किनारे से खाया करो,
खाने के बीच से मत खाया करो।"

📕 तिर्मिजी: १८०५

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दुनियावी ज़िन्दगी धोका है

दुनियावी जिन्दगी एक धोका है

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है :

"दुनियावी ज़िन्दगी तो कुछ भी नहीं सिर्फ धोके का सौदा है।”

📕 सूरह आले इमरान : १८५

“ऐ लोगो! बेशक अल्लाह तआला का वादा सच्चा है, फिर कहीं तुम को दुनियावी जिन्दगी धोके में न डाल दे और तुम को धोके बाज़ शैतान किसी धोके में न डाल दे, यकीनन शैतान तुम्हारा दुश्मन है। तुम भी उसे अपना दुश्मन ही समझो। वह तो अपने गिरोह (के लोगों) को इस लिये बुलाता है के वह भी दोज़ख वालों में शामिल हो जाएँ।”

📕 सूरह फातिर ५ ता ६

"ऐ इन्सान ! तुझे अपने रब की तरफ से किस चीज़ ने धोके में डाल रखा है (कि तू दुनिया में पड़ कर उसे भुलाए रखता है हालाँकि) उस ने तुझे पैदा किया (और) फिर तेरे तमाम आज़ा एक दम ठीक अन्दाज़ से बनाए। (फिर भी तू उससे गाफिल है)।"

📕 सूरह इन्फित्तार; ६

फायदा : जिस तरह माल के जाहिर को देख कर खरीदार फँस जाता है, इसी तरह इंसान दुनिया की चमक दमक से धोका खा कर आखिरत से गाफिल हो जाता है, इसलिए इन्सानों को दुनिया की चमक दमक से होशियार रहना चाहिए।

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बुरे आमाल की नहूसत

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

"खुश्की और तरी (यानी पूरी दुनिया) में लोगों के बुरे आमाल की वजह से हलाकत व तबाही फैल गई है, ताके अल्लाह तआला उन्हें उन के बाज़ आमाल (की सज़ा) का मजा चखा दे, ताके वह अपने बुरे आमाल से बाज आ जाएँ।"

📕 सूरह रूम: ४१

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मोमिन का ऐब छुपाने की फ़ज़ीलत

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

"जो मोमिन अपने भाई के किसी ऐब को छुपाएगा तो अल्लाह तआला उसकी वजह से उस को जन्नत में दाखिल फरमाएगा"

📕 तबरानी औसत: १५३६

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नमाज़ छोड़ने पर वईद

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया :

"नमाज का छोड़ना मुसलमान को कुफ़ व शिर्क तक पहुँचाने वाला है।” 📕 मुस्लिम: २७

"नमाज़ का छोड़ना आदमी को कुफ्र से मिला देता है।" 📕 मुस्लिम : २४६

"ईमान और कुफ्र के दरमियान फर्क करनेवाली चीज़ नमाज़ है।" 📕 इब्ने माजा : १०७८

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अज़ान की इब्तेदा

हजरत इब्ने उमर (र.अ) फ़र्माते हैं के हुजूर (ﷺ) ने जमात की नमाज के लिये जमा करने का मशवरा किया, तो सहाब-ए-किराम (र.अ) ने मुख़्तलिफ राएँ पेश की, किसी ने यहूद की तरह बूक (Beegle) बजाने और किसी ने ईसाइयों की तरह नाकूस (घंटी) बजाने का मशवरा दिया, लेकिन आप (ﷺ) ने पसंद नहीं फ़र्माया।

बल्के सोचने का मौका दिया, उसी रात हज़रत उमर (र.अ) ने ख्वाब में अजान सुनी और एक सहाबी अब्दुल्लाह बिन जैद बिन अब्दे रब्दिही (र.अ) ने भी ख़्वाब में देखा, के एक शख्स अजान के कलिमात कह रहा है, उन्होंने उस को याद कर लिया और आँख खुलते ही रसूलुल्लाह (ﷺ) के पास तहज्जुद के वक्त पहुँचे और ख़्वाब सुनाया।

आप (ﷺ) ने हजरत बिलाल (र.अ) को उन कलिमात के साथ फज्र की अजान देने का हुक्म फर्माया, अजान सुनते ही हज़रत उमर (र.अ) दौड़े हुए आए और अर्ज किया: मैंने भी इसी तरह अज़ान के कलिमात को ख्वाब में सुना है, उस के बाद से ही अजान देने का सिलसिला शुरू हो गया।

इस्लाम में सब से पहले मोअज्जिन हजरत बिलाल (र.अ) हुए और दूसरे हज़रत अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम (र.अ) बने। हजरत बिलाल ने फज्र की अजान में सबसे पहले (Assalatu khairum minannaum) यानी नींद से बेहतर नमाज़ है.) कहा जिस को हुजूर ने पसन्द फर्माया।

📕 इस्लामी तारीख

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हज़रत उमर (र.अ) के हक में दुआ

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने हज़रत उमर के लिये दुआ फ़र्माई के:

"ऐ अल्लाह ! उमर बिन खत्ताब (र.अ) के जरिये इस्लाम को इज्जत व बुलन्दी अता फ़र्मा",

चुनान्चे ऐसा ही हुआ के अल्लाह तआला ने इस्लाम को हज़रत उमर (र.अ) के जरिये वह बुलन्दी और शौकत अता फर्माई के दुनिया उस का एतेराफ करती है।

📕 इब्ने माजा : १०५

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बिमारियों का इलाज

हज़रत अनस (र.अ) के पास दो शख्स आए, जिन में से एक ने कहा: ऐ अबू हम्जा (यह हजरत अनस (र.अ) की कुन्नियत है) मुझे तकलीफ है, यानी मैं बीमार हूँ, तो हजरत अनस (र.अ) ने फ़रमाया: क्या मैं ! तुम को उस दुआ से दम न कर दूं जिस से रसूलुल्लाह (ﷺ) दम किया करते थे? उस ने कहा :जी हाँ जरूर , तो उन्होंने यह दुआ पढ़ी:

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! लोगों के रब! तकलीफ को दूर कर देने वाले, शिफा अता फरमा, तू ही शिफा देने वाला है तेरे सिवा कोई शिफा देने वाला नहीं, ऐसी शिफा अता फरमा के बीमारी बिलकुल बाकी ना रहे।

📕 बुखारी : ५७४२

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जहन्नमियों का खाना

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है :

"जहन्नम वालों का आज न कोई दोस्त होगा और न कोई खाने की चीज़ नसीब होगी, सिवाए जख्मों के धोवन के जिस को बड़े गुनहगारों के सिवा कोई न खाएगा।

📕 सूरह हाक्का : ३५ ता ३७


“दोज़खियों को खौलते हुए चश्मे का पानी पिलाया जाएगा, उन को कांटेदार दरख्त के अलावा कोई खाना नसीब न होगा, जो न मोटा करेगा और न भूक को दूर करेगा।”

📕 सूर-ए-गाशीया: ५ ता ७

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दो चीज़ों की ख्वाहिश

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

"बूढ़े आदमी का दिल दो चीजों के बारे में हमेशा जवान रहता है, एक दुनिया की मुहब्बत और दूसरी लम्बी लम्बी उम्मीदें।"

📕 बुख़ारी: ६४२०

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अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक न करो

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

"अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक न करो, माँ, बाप के साथ अच्छा सुलूक करो, और तंगदस्ती के खौफ से अपनी औलाद को कत्ल न करो, हम तुम, को भी रिज्क देते हैं और उन को भी; खुले और छुपे बेहयाई के कामों के करीब न जाओ।”

📕 सूरह अन्आम : १५२

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मस्जिदे नबवी की तामीर

हिजरत के बाद रसूलुल्लाह (ﷺ) ने सब से पहले एक मस्जिद की तामीर फ़रमाई, जिस को आज "मस्जिदे नब्वी" के नाम से जाना जाता है। उस के लिये वही जगह मुन्तखब की गई थी, जहाँ हुजूर (ﷺ) की ऊँटनी बैठी थी, यह जमीन बनू नज्जार के दो यतीम बच्चों की थी, जिस को आप (ﷺ) ने कीमत दे कर खरीद लिया था। उसकी तामीर में सहाब-ए-किराम (र.अ) के साथ आप भी पत्थर उठाते थे, सहाब-ए-किराम जोश में यह अश्आर पढ़ते थे और आप भी उनके साथ आवाज़ मिलाते और पढ़ते:
तर्जुमा: "ऐ अल्लाह ! अस्ल उजरत तो आखिरत की उजरत है, ऐ अल्लाह ! अन्सार व मुहाजिरीन पर रहम फ़र्मा।"

यह मस्जिद इस्लाम की सादगी की सच्ची तसवीर थी, इस मस्जिद के तीन दरवाजे बनाए गए थे, दरवाजे के दोनों पाए पत्थर के और दीवारें कच्ची ईंट और गारे की बनाई गई थीं। सुतून खजूर के तनों से और छत खजूर की शाखों और पत्तों से तय्यार की गई थी। किले की दीवार से पिछली दीवार तक सौ हाथ की लम्बाई थी।

यह मस्जिद सिर्फ नमाज अदा करने के लिये ही नहीं बल्के इस्लामी तालीम के लिये एक दर्सगाह और दावत व तब्लीग़ और दुनिया के सारे मसाइल को हल करने के लिये एक मरकज़ भी थी। इस के इमाम अल्लाह के नबी (ﷺ) और इस के नमाज़ी सहाब-ए-किराम (र.अ) जैसी मुक़द्दस हस्तियाँ थीं।

To be Continued ....

📕 इस्लामी तारीख

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इशा के बाद दो रकात नमाज पढना

हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (र.अ) बयान फ़र्माते हैं के,

“मैंने रसूलुल्लाह (ﷺ) के साथ ईशा की फर्ज नमाज़ के बाद दो रकात (सुन्नत) पढ़ी है।”

📕 बुखारी : ११७२

फायदा: इशा की नमाज के बाद वित्र से पहले दो रकात पढ़ना सुन्नते मोअक्कदा है।

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इंसाफ करने की फ़ज़ीलत

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

"थोड़ी देर का इन्साफ साठ साल की शब बेदारी और रोजा रखने की इबादत से बेहतर है।
ऐ अबू हुरैरा (र.अ) ! किसी मामले में थोड़ी सी देर का जुल्म, अल्लाह के नजदीक साठ साल की नाफ़रमानी से जियादा सख्त और बड़ा गुनाह है।"

📕 तरघिब वा तरहीब: ३१२८

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देवर तो मौत है | शौहर के भाइयों से परदे का हुक्म

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

"ना महरम) औरतों के पास आने जाने से बचो!
एक अन्सारी सहाबी ने अर्ज किया : देवर के बारे में आप क्या फ़र्माते हैं ?
तो आप (ﷺ) ने फर्माया: देवर तो मौत है।"

📕 बुखारी : ५२३२

वजाहत: शौहर के भाई वगैरह से परदा करना इन्तेहाई जरूरी है
और उस से इस तरह बचना चाहिये। जिस तरह मौत से बचा जाता है।

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बाएँ हाथ से ना खाएं और ना पियें

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

"तुम में से कोई अपने बाएँ हाथ से हरगिज़ न खाए और न बाएँ हाथ से पिये, क्योंकि शैतान अपने बाएँ हाथ से खाता पीता है।"

📕 मुस्लिम: ५२६७

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गूलर के फल में अल्लाह की कुदरत

अल्लाह तआला ने दुनिया में हजारों किस्म के फल पैदा किये लेकिन गूलर के फल में अल्लाह तआला ने अपनी कुदरत का इस तरह इजहार फ़र्माया के जब गूलर का फल पक जाता है तो उसकी तोड़ने पर बोहोत से कीडे निकलते हैं, जो अपने परों के जरिये उड कर गायब हो जाते हैं।

आखिर इस गूलर के फल में यह उड़ने वाले कीड़े कहाँ से आ गए? जब के उस में दाखिल होने का कोई रास्ता भी नहीं है...

यकीनन अल्लाह ही ने अपनी कुदरत से गूलर के फल में च्यूटी नुमा कीड़े पैदा फरमाए हैं।

📕 अल्लाह की कुदरत

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आबे ज़म ज़म से इलाज

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

"जमीन पर सबसे बेहतरीन पानी आबे जम जम है, यह खाने वाले के लिये खाना और बीमार के लिये शिफा है।"

📕 तबरानी औसत: ४०५९

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क़यामत के दिन खुश नसीब इन्सान

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया:

"कयामत के दिन लोगों में से वह खुश नसीब मेरी शफाअत का मुस्तहिक होगा, जिसने सच्चे दिल से "कलिम-ए-तय्यिबा" “ला इलाहा इलल्लाहु” पढ़ा होगा।"

📕 बुखारी : १९

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हलाक करने वाली चीजें

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

"हर ऐसे शख्स के लिये बड़ी ख़राबी है, जो ऐब लगाने वाला और ताना देने वाला हो,
जो माल जमा करता हो और उस को गिन गिन कर रखता हो
और ख़याल करता हो के उस का (यह) माल हमेशा उस के पास रहेगा। हरगिज़ ऐसा नहीं है, वह ऐसी आग में डाला। जाएगा जिसमें जो कुछ पड़ेगा वह उस को तोड़फोड़ कर रख देगी।"

📕 सूरह हुमज़ह : १ ता ४

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रसूल (ﷺ) के हुक्म को न मानने का गुनाह

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

"जो लोग रसूलुल्लाह (ﷺ) के हुक्म की खिलाफ वरजी करते हैं,
उनको इस से डरना चाहिये के कोई आफत उन पर आ पड़े
या कोई दर्दनाक अज़ाब उन पर आ जाए।"

📕 सूरह नूर : ६३

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अल्लाह की राह में अपनी जवानी लगाने की फ़ज़ीलत

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया:

"जिसने अपनी जवानी अल्लाह के रास्ते में गुजार दी, तो कयामत के दिन उस के लिये एक नूर होगा।"

📕 निसाई : ३१४४

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बुरे लोगों की सोहबत से बचने की दुआ

अपने आप को और अपनी औलाद को बुरे लोगों की सोहबत से बचाने के लिये यह दुआ पढ़े:

“Rabbi najjinee waahlee mimma yaAAmaloon”

तर्जमा: ऐ मेरे रब! मुझे और मेरे अहल व अयाल को उनके (बुरे) काम से नजात अता फ़र्मा।

📕 सूरह शुअरा : १६९

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नमाज़ छोड़ने का नुकसान

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

"जिस शख्स की एक नमाज़ भी फौत हो गई वह ऐसा है के गोया उस के घर के लोग और माल व दौलत सब छीन लिया गया।"

📕 इब्ने हिब्बान : १४९०

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आँखों की बीनाई का लौट आना

हज़रत हबीब बिन अबी फुदैक (र.अ) फ़र्माते हैं के मेरे वालिद की आँखें सफेद हो गईं थीं जिस की वजह से उनको कोई चीज़ नज़र नहीं आती थी, तो एक दिन मेरे वालिद हुजूर (ﷺ) की ख़िदमत में जाना चाहते थे तो मुझे साथ ले लिया, जब हम वहाँ पहुँचे तो हुजूर (ﷺ) ने पूछा यह क्या हुआ ? मेरे वालिद ने फर्माया मैं अपने ऊँट को तेल लगा रहा था इतने में मेरा पैर साँप के अँडे पर पड़ गया तब से मेरी यह हालत हो गई है, तो हुजूर (ﷺ) ने उनकी आँखों पर दम किया, आँखें उसी वक़्त अच्छी हो गईं।

हज़रत हबीब फ़र्माते हैं के मेरे वालिद ८० बरस की उम्र में भी सूई में धागा पिरो लिया करते थे।

📕 दलाइलु न्नुबुव्वह लि अबी नुऐम : ३८४

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मदीना मुनव्वरा

तुफाने नूह के बाद हज़रत नूह (अ.) के परपोते इमलाक़ बिन अरफख्शज बिन साम बिन नूह यमन में बस गए थे। अल्लाह तआला ने उन को अरबी जबान इलहाम की, फिर उन की औलाद ने अरबी बोलना शुरू कर दिया, यह अरब के इलाकों में चारों तरफ फैले, इस तरह पूरे जज़ीरतुल अरब में अरबी जबान आम हो गई, उसी जमाने में मदीना की बुनियाद पड़ी, इमलाक़ की औलाद में तुब्बा नामी एक बादशाह था, जिस ने यहूदी उलमा से आखरी नबी की तारीफ और यसरिब (मदीना) में उन की आमद की खबर सुन रखी थी, इस लिये शाह तुब्बा ने यसरिब में एक मकान हुजूर (ﷺ) के लिये तय्यार कर के एक आलिम के हवाले कर दिया और वसिय्यत की के यह मकान नबी ए आखिरुज ज़माँ की आमद पर उन्हें दे देना, अगर तुम जिन्दा न रहो तो अपनी औलाद को इस की वसिय्यत कर देना।

चुनान्चे हुजूर (ﷺ) की ऊँटनी हजरत अबू अय्यूब अन्सारी (र.अ) के मकान पर रुकी थी, हजरत अबू अय्यूब (र.अ) उन आलिम ही की औलाद में से थे, जिन को शाहे तुब्बा ने मकान हवाले किया था, साथ ही शाह तुब्बा ने एक खत भी हुजूर (ﷺ) के नाम लिखा, जिस में आप (ﷺ) से मुहब्बत, ईमान लाने और ज़ियारत के शौक़ को जाहिर किया था। हुजूर (ﷺ) की हिजरत के बाद यसरिब का नाम बदल कर "मदीनतुर रसूल" यानी रसूल का शहर रखा गया।

To be Continued ...

📕 इस्लामी तारीख

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इन्सान की पैदाइश तीन अंधेरों में

काइनात की सब से हसीन तरीन मख्लूख “इन्सान” जिस के लिये अल्लाह तआला ने इस कारखान ए आलम को वुजूद बख्शा है, उसकी तखलीख अल्लाह तआला जहाँ कर रहा हैं, वह जगह न बहुत बड़ी है और न वहाँ रोशनी का इन्तज़ाम है, न वहाँ कोई काम करने वाले हैं, बल्के अल्लाह तआला एक तंग जगह माँ के पेट में तीन अंधेरों में उसकी तख़लीक़ कर रहा हैं।

जब के दुनिया में मेनू फैक्चरिंग जहाँ होती है, वह जगह कई एकड़ों में फैली हुई होती है, रोशनी और कुमकुमे लगे होते हैं और बेशुमार काम करने वाले होते हैं, यहाँ कुछ भी नहीं, फिर भी अल्लाह तआला इन्सान की पैदाइश कर रहा है, यह अल्लाह की बड़ी ज़बरदस्त कुदरत है।

📕 अल्लाह की कुदरत

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वह मुबारक घर जहाँ आप (ﷺ) ने कयाम फर्माया

वह मुबारक घर जहाँ आप (ﷺ) ने कयाम फर्माया

रसूलुल्लाह (ﷺ) जब मक्का से हिजरत कर के मदीना आए, तो यहाँ के लोगों ने आप (ﷺ) का पुर जोश इस्तिकबाल किया। कुबा से मदीना तक रास्ते के दोनों जानिब सहाब-ए-किराम की मुक़द्दस जमात सफ बनाए हुए खड़ी थी।

जब आप मदीने में दाखिल हए तो हर कबीले और खान्दानवाला ख्वाहिशमन्द था और हर शख्स की दिली तमन्ना थी के हुजर की मेजबानी का शर्फ हमें नसीब हो, चुनान्चे आपकी खिदमत में ऊँटनी की नकील पकड़कर हर एक अर्ज करता के मेरा घर, मेरा माल और मेरी जान सबकुछ आपके लिये हाजिर है।

मगर आप उन्हें दूआए खैर व बरकत देते और फ़र्माते ऊँटनी को छोड़ दो, जहाँ अल्लाह का हुक्म होगा वहीं ठहरेगी, ऊँटनी चल कर हजरत अबू अय्यूब अंसारी (र.अ) के मकान के सामने रुक गई। सय्यदना अबू अय्यूब अन्सारी (र.अ) ने इन्तेहाई खुशी व मसर्रत के आलम में कजावा उठाया और अपने घर ले गए। इस तरह उन्हें रसूलुल्लाह (ﷺ) की मेजबानी का शर्फ हासिल हुआ।

आप ने सात माह तक उस मकान में क्रयाम फ़र्माया।

📕 इस्लामी तारीख

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कुरआन का मजाक उड़ाने का गुनाह

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

"जब इन्सान के सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो कहता है के यह पहले लोगों के किस्से कहानियां हैं। हरगिज़ नहीं! बल्के उन के बुरे कामों के सबब उन के दिलों पर जंग लग गया है।"

📕 सूरह मुतफ्फिफीन: १३ ता १४

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तलबीना से इलाज

हजरत आयशा (र.अ) बीमार के लिये तलबीना तय्यार करने का हुकम देती थीं
और फर्माती थीं के मैंने हुजूर (ﷺ) को फ़र्माते हुए सुना के:

"तलबीना बीमार के दिल को सुकून पहुँचाता है और रंज व ग़म को दूर करता है।”

📕 बुखारी: ५६८९

फायदा: जौ (बरली) को कट कर दूध में पकाने के बाद मिठास के लिए इस में शहद डाला जाता है; इस को तलबीना कहते हैं।

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खाना खाते वक्त टेक न लगाना

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फर्माया:

"मैं टेक लगा कर नहीं खाता हूँ।”

📕 बुखारी: ५३९८

फायदा: बिला उज्र टेक लगा कर खाना सुन्नत के खिलाफ है।

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हर शख्स मौत के बाद अफसोस करेगा

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:

"हर शख्स मौत के बाद अफसोस करेगा, सहाबा ने अर्ज किया: या रसूलअल्लाह (ﷺ) ! किस बात का अफसोस करेगा? आप (ﷺ) ने फ़र्माया : अगर नेक है, तो जियादा नेकी न करने का अफसोस करेगा और अगर गुनहगार है तो गुनाह से न रूकने पर अफसोस करेगा।"

📕 तिर्मिज़ी : २४०३

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माल की मुहब्बत खुदा की नाशुक्री का सबब है

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

“इन्सान अपने रब का बड़ा ही नाशुक्रा है, हालाँ के उसको भी इस की खबर है (और वह ऐसा मामला इस लिये करता है) के उस को माल की मुहब्बत ज़ियादा है।"

📕 सूरह आदियात: ६ ता ८

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वालिदैन के साथ एहसान का मामला करो

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

"तुम्हारे रब (अल्लाह) ने फैसला कर दिया है उसके के अलावा किसी और की इबादत न करो और वालिदैन के साथ एहसान का मामला करो।"

📕 सूरह बनी इस्राईल : २३

खुलासा: माँ बाप की खिदमत करना और उनके साथ अच्छा बरताव करना फर्ज है।

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किला फतह होना

जंगे खैबर के दिन चन्द आदमी रसूलुल्लाह (ﷺ) के पास आ कर भूक की शिकायत करने लगे और रसूलुल्लाह (ﷺ) से सवाल करने लगे, लेकिन हुजूर (ﷺ) के पास कोई चीज़ न थी, तो आप ने अल्लाह तआला से दुआ की :

या अल्लाह ! तू इन की हालत से वाकिफ है, इन के पास खाने के लिये ही कुछ भी नहीं और न ही मेरे पास है के मैं इन को दूँ, या अल्लाह ! तू इन के लिये खैबर का ऐसा किला फतह करदे जो सब किलों में माल व दौलत के एतेबार से जियादा फरावानी रखता हो,

चुनान्चे अल्लाह तालाने सअब बिन मुआज का किला फतह कर दिया जो खैबर के सब किलों में मालदार था।

📕 बैहक़ी फी दलाइलिन्नुबुबह : १५६७

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