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मुस्लिम औरत | दुनिया की सबसे बेहतरीन पूंजी

इस पोस्ट में हम मुस्लिम औरत की पहचान और खूबियाँ, उसकी जिम्मेदारियां, और उसको मिलने वाले हुकूक, उसकी नादानियों और शर्र की वजह से होने वाले हश्र पर गौर करेंगे।

मुस्लिम ख़्वातीन से मुताअ़ल्लिक़ मोअ्तबर अह़ादीस़ का एक मुख़्तसर मजूमुआ

औरत / माँ की रह़मत

उमर बिन ख़त्ताब रजिअल्लाहु अ़न्हु फ़रमाते हैं कि वो अल्लाह के नबी ﷺ के पास कुछ क़ैदी ले कर आए।
उन कैदियों में एक औ़रत भी थी जो (अपने) बच्चे को तलाश कर रही थी। जब उसे कोई बच्चा मिलता उसे अपने सीने से लगा लेती और दूध पिलाती। ये मंज़र देख कर अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया: इस औ़रत के बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है, क्या ये अपने बच्चे को आग में फैंक सकती है ? हम ने अ़र्ज़ किया: अल्लाह की क़सम, उस का बस चले तो वो कभी ऐसा ना होने दगी।

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "वल्लाह, इस औ़रत को अपने बच्चे पर जितना रह़म है उस से कहीं ज़ियादा अल्लाह अपने बंदों पर रह़ीम है।"

📕 बुख़ारी; अल अ़दब 5999, मुस्लिम: अत्तौबा 4947


मां बेहतरीन सुलुक की ह़क़दार है

अबू हुरैराह रजिअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है
फ़रमाते हैं: एक शख़्स़ अल्लाह के रसूल ﷺ के पास आया और कहा: ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे अच्छे सुलूक का सबसे ज़ियादा ह़क़दार कौन है ? आप ﷺ ने फ़रमाया: तेरी वालिदा । उसने फिर पूछा: उसके बाद कौन ? आप ने जवाब दिया: उसके बाद तेरी वालिदा । उसने फिर पूछा: उसके बाद कौन ? आप ने फिर जवाब दिया: उसके बाद तेरी वालिदा । उसने मज़ीद पूछा: उसके बाद कौन ? आप ने जवाब दिया: फिर तेरे वालिद ।

📕 बुख़ारी: अल अ़दब 5971
📕 मुस्लिम: अलबिर वस्सिला वल आदाब 4621


बच्चियों का अच्छा नाम रखना

इब्ने उमर रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि;
"उमर रज़िअल्लाहु अ़न्हु की एक बेटी थी जिसका नाम आ़स़िया था, अल्लाह के रसूल ﷺ ने उस का नाम (बदल कर) जमीला रक दिया।"

📕 मुस्लिम: अल अ़दब 3988


बेटियों की परवरिश का अजर व सवाब

उक्बा बिन आ़मिर रज़िअल्लाहु अ़न्हु फ़रमाते हैं कि मैं ने अल्लाह के रसूल ﷺ को यूं फ़रमाते सुना:
"जिस की तीन बेटियां हो, और वो उन पर सब्र करे और अपनी ताक़त के बक़द्र उन्हें खिलाए पिलाए और पहनाए तो ये बेटियां कियामत के दिन उस के लिए जहन्ऩम की आग से बचाव का ज़रिया बनेंगी।"

📕 मुस्नद अहमद, इब्ने माजा
📕 स़ही़ह़ अल जामे 6488-स़ही़ह़


नेक औ़रत बेहतरीन मताअ़् है

अब्दुल्लाह बिन अ़म्र से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"दुनिया मताअ़् है, और दुनिया की बेहतरीन पूंजी नेक औ़रत है।"

📕 मुस्लिम: अर् रिज़ाअ़ 6228


बेहतरीन औ़रत और बद्तरीन औ़रत

अबू उज़ैना सदफ़ी रज़िअल्लाह अ़न्हु रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"तुम्हारी औ़रतों में बेहतरीन औ़रत वो हैं जो निहायत मुहब्बत करने वाली, खूब औलाद वाली, शोहर की मुवाफ़िक़त करने वाली और ताउन करने वाली हैं बशर्त़ कि अल्लाह से डरने वाली हो।"

और तुम्हारी बद्तरीन औ़रतें वो हैं जो बेपर्दा हो कर अपनी ज़ीनत का इज़हार करने वाली और फ़ख़र करने वाली हैं, दरह़क़ीक़त यहीं मुनाफ़िक़ औ़रतें हैं। उन में से इतनी ही जन्ऩत में दाखिल होगी जितने सफ़ेद परों या पंजों वाले कव्वे होते हैं ।

📕 (बैहकी) रावी: अबू उज़ैना सदफ़ी रज़िअल्लाह अ़न्हु
📕 (सिलसिला अस्सहीहा (4/464) रक़म 1849) (स़ही़ह़)


किस औ़रत से निकाह़ बेहतर है?

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"औ़रत से चार चीज़ों की बुनियाद पर निकाह़ किया जाता है । उसके माल, उसके ख़ानदान, उसकी खूबसूरती और उसके दीन की बुनियाद पर। लिहाज़ा तू दीनदार को अपने लिए इख़्तियार कर के कामियाब हो जा, तेरे हाथ ख़ाक आलूद हों।"

📕 बुख़ारी: अन्ऩिक़ाह 5090
📕 मुस्लिम: अर रिज़ाअ़ 2661

इब्ने ह़िब्बान के अल्फ़ाज़ हैं:
"तू ज़रूर दीनदार ही को इख़्तियार कर, तेरे हाथ ख़ाक आलूद हों।"

📕 इब्ने ह़िब्बान; अत्तालीकातुल ह़िसान 4025-स़ही़ह़


बेहतरीन बीवी कौन ?

अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"सब से बेहतरीन औ़रत (बीवी) वो है कि जब तू उसे देखे तो वो तुझे ख़ुश करे, और जब तू उसे कोई हुक्म दे तो तेरी फ़रमांबरदारी करे, और तेरी गै़र मौजूदगी में अपनी इज़्ज़त और तेरे माल की हिफ़ाज़त करे।"

📕 त़बरानी
📕 सहीह अल जामे 3299


शोहर की फ़रमांबरदार औरत की फ़ज़ीलत

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"जब एक औ़रत अपनी पांच नमाज़ें अदा करे, (रमज़ान के) महीने के रोज़े रखे, अपनी शरमगाह की हिफ़ाज़त करे, और अपने शोहर की फ़रमांबरदारी करे तो वो (कियामत के दिन) जन्ऩत के जिस दरवाज़े से चाहे उस में दाख़िल होगी।"

📕 इब्ने ह़िब्बान
📕 सहीह अल जामे 660


दीन व दुनिया में शोहर का तआ़वुन करना

अबू उमामा रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने मुआ़ज़ बिन ज़बल से फ़रमाया:
"ऐ मुआ़ज़! शुक्र करने वाला दिल, ज़िक्र करने वाली ज़बान और नेक बीवी जो दुनिया और दीन के मुआ़मले में तेरी मदद करे उन तमाम ख़ज़ाने से बेहतर है जो लोग जमा कर रहे हैं।"

📕 बैहक़ी
📕 सहीह अल जामे 4409


शोहर का बीवी पर हक़

अब्दुल्लाह बिन औफ़ रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, फ़रमाते हैं:
जब मुआ़ज़ रज़िअल्लाहु अ़न्हु मुल्के शाम से लौटे तो आते ही नबी ﷺ के आगे सज्दे में गिर गए।

आप ﷺ ने पूछा: ऐ मुआ़ज़ ये क्या है? वो बोले: मैं शाम गया तो देखा कि वहां लोग अपने बड़ों और सरदारों को सज्दा करते हैं लिहाज़ा मुझे ये बात बहुत अच्छी लगी कि हम आप के साथ भी ऐसा ही करे। अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया:

"ऐसा हर्गिज़ ना करना। अगर मैं किसी को हुक्म देता कि वो अल्लाह के सिवा किसी को सज्दा करे तो औ़रत को हुक्म देता कि वो अपने शोहर को सज्दा करे।"

📕 इब्ने माजा 1503-ह़सन स़ही़ह़

एक रिवायत में यूं हैं: "किसी बशर के लिए ये स़ही़ह़ नहीं कि वो किसी बशर को सज्दा करे। अगर ये बात दुरूस्त होती कि एक बशर दूसरे बशर को सज्दा करे तो मैं औ़रत को हुक्म देता कि वो अपने उपर अपने शोहर के हक़ की अज़मत के सबब उसे सज्दा करे।"

📕 मुस्नद अहमद, नसाई; रावी: अनस
📕 स़ही़ह़ अल जामे 7725-स़ही़ह़

मालूम हुआ के बीवी के लिए शोहर का मक़ाम बोहोत ही ऊँचा है, बावजूद इसके शोहर को सजदा करना जायज़ नहीं, क्यूंकि सजदा खालिस अल्लाह सुब्हानहु तआला के लिए है।


शोहर की नाशुक्री का अन्जाम

इब्ने अ़ब्बास रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"मुझे जहन्ऩम दिखाई गई तो मैं ने देखा कि उस में अक्सरिय्यत औ़रतों की है। (क्यूंकि) वो (नाशुक्री, इन्कार) करती हैं।"

पूछा गया: क्या अल्लाह से कुफ्र करती हैं ?

आप ﷺ ने फ़रमाया: "शोहर का इन्कार करती हैं। एहसान का इन्कार करती हैं। अगर उन में से तू किसी पर एक ज़माने तक एहसान करता रहे फिर वो तुझ से कुछ कमी देखे तो फ़ौरन कहती है: मैं ने तुम्हारी त़रफ़ से कभी कोई भलाई नहीं देखी।"

📕 बुख़ारी: अल ईमान 29,
📕 मुस्लिम: अल कसूफ 1512


शोहर को राज़ी करने की फ़ज़ीलत

इब्ने अ़ब्बास रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"क्या मैं तुम्हें जन्ऩती मर्द कौन हैं ना बतादूं? लोगों ने अ़र्ज़ किया: ज़रूर ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ ! आप ने फ़रमाया: नबी जन्ऩती है, सिद्दीक़ जन्ऩती है, शहीद जन्ऩती है, बचपन ही में फौत होने वाला बच्चा जन्ऩती है, और वो शख़्स़ भी जन्ऩती है जो शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में अपने मुसलमान भाई से सिर्फ़ अल्लाह की ख़ातिर मुलाक़ात के लिए जाता है।

और तुम्हारी जन्ऩती औ़रतें वो हैं जो अपने शोहर से मुहब्बत करने वाली, उस के लिए ख़ैर ही का ज़रिया बनने वाली हैं, ऐसी औ़रत कि जब उस का शोहर उस से नाराज़ हो जाए तो खुद शोहर के पास जाए और उसके हाथ में अपना हाथ दे कर कहे: मैं उस वक़्त तक नींद की राह़त नहीं पा सकती जब तक आप मुझसे राज़ी ना हो जाए।"

📕 तमाम फ़ी फ़वाइदिही, बैहक़ी, त़बरानी
📕 अस़्सह़ीह़ा 1/578 रक़म 287


शोहर की ह़ाजत की रिआ़यत करने की अहमियत

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"उस जात की क़सम जिस के हाथ में मेरी जान है! जो भी शख़्स़ अपनी बीवी को अपने बिछोने की त़रफ़ बुलाता है और वो उस का इन्कार करती है तो वो (अल्लाह) जो आसमान पर है उस औ़रत से नाराज़ ही रहता है जब तक कि उस का शोहर उस से राज़ी ना हो जाए।"

📕 मुस्लिम: अन्ऩिकाह 2595


बीवियों में अ़दल की अहमियत

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"जब किसी शख़्स़ की दो बीवियां हो, और वो उन के दरमियान अ़दल (इंसाफ) ना करे तो क़ियामत के दिन वो इस हाल में आएगा कि उस का एक पहलू साक़ित (paralysed)  होगा।"

📕 तिर्मिज़ी, हाकिम
📕 स़ही़ह़ अल जामे 761


औ़रत का मर्द पर ह़क़

मआ़विया अल कुशैरी रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत हैं, फ़रमाते हैं: मैं ने अर्ज़ किया:
"ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ हमारी बीवियों का हम पर क्या ह़क़ है?"

आप ﷺ ने फ़रमाया: ये कि जब तुम खाओ तो उन्हें भी खिलाओ, और तुम पहनो तो उन्हें भी पहनाओ, या फ़रमाया कि जब तुम कमाओ तो उन्हें पहनाओ। और उन के चेहरे पर ना मारो, और ना उन्हें बुरा कहो, और अगर उन से दूरी इख़्तियार करो तो घर ही में करो।

इमाम अबू दाऊद कहते हैं कि "उन्हें बुरा ना कहो" का मतलब है: उन्हें इस त़रह़ ना कहो कि अल्लाह तेरा बुरा करे। (या अल्लाह तुझे ज़लील व रूस्वा करे)"

📕 मुस्नद अहमद, अबू दाऊद, नसाई, इब्ने माजा-अल्फ़ाज़ अबू दाऊद के हैं।
📕 सुनन अबी दाऊद बि तहक़ीक़िल अल्बानी 2142-ह़सन स़ही़ह़


औ़रत की कमियों के बावजूद उस से नफ़रत ना करने का हुक्म

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"कोई मोमिन मर्द किसी मोमिन औ़रत से नफ़रत ना रखे, अगर इस में कोई स़िफ़त उसे नापसंद हो भी तो उस में कोई ऐसी स़िफ़त भी ज़रूर होगी जो उसे पसंद आ जाएगी।"

📕 मुस्लिम: अर रिज़ाअ़ 2672


बीवी से अच्छे सुलूक का हुक्म

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"ईमान वालों में सब से कामिल ईमान वाले वो हैं जो अख़्लाक़ में ज्यादा अच्छे हो, और तुम में सब से अच्छे इंसान वो हैं जो अपनी बीवियों से (सुलूक में) अच्छे हों।"

📕 तिर्मिज़ी, इब्ने माजा
📕 स़ही़ह़ अल जामे 1232


औ़रत की फितरत : टेढ़ी पस्ली से बनी है

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"औ़रत पस्ली की त़रह़ है, अगर तू उसे सीधा करने की कोशिश करे तो उस को तोड़ देगा। और अगर तू उस से फ़ायदा हासिल करना चाहे तो उस के टेढ़ेपन के बावजूद भी फ़ायदा हासिल कर सकता है।"

📕 बुखारी: अन्ऩिकाह 5188,
📕 मुस्लिम: अर रिज़ाअ़ 2669

और मुस्लिम के अ़ल्फ़ाज यूं है:
"और अगर तू उसे पूरी त़रह़ सीधा करने की कोशिश करेगा तो उसे तोड़ देगा। और उस का तोड़ना तलाक़ है।"

और एक रिवायत में यूं हैं:
"औ़रत से अच्छा सुलूक करो, इस लिए कि औ़रत पस्ली से पैदा की गई है, और पस्ली का टेढ़ापन सब से ज़ियादा उस के ऊपरी हिस्से में होता है, अब अगर तू उसे बिल्कुल सीधा करने की कोशिश करे तो उसे तोड़ देगा। और अगर तू उसे उस के हाल पर रहने दे तो वो टेढ़ा ही रहेगा । लिहाज़ा औ़रतों से भलाई का सुलूक करते रहो।

📕 बुखारी: अहदीसुल अंम्बियां 3331
📕 मुस्लिम: अर रिज़ाअ 3671


ह़ाएज़ा औ़रत से शफ़कत व मुहब्बत से पेश आना

आ़ईशा रज़िअल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं: "मैं ह़ैज़ की हालत में हुवा करती और पानी पी कर बर्तन अल्लाह के नबी ﷺ को दे दिया करती। आप वहीं से मुंह लगा कर पीते जहां से मैं ने पिया था। और ह़ैज़ ही की हालत में मैं हड्डी चूस कर आप को दे देती फ़िर आप उसी जगा मूं लगा कर खाते जहां से मैंने खाया था।"

📕 मुस्लिम: अल ह़ैज़ 453

इस से वाजेह होता है के हैज़ की हालात में औरतो से गैरो जैसा सुलूक करना जायज़ नहीं।


बीवियों से मिज़ाह़ करना

आ़ईशा रज़िअल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं:
"मैं एक सफ़र में नबी ﷺ के साथ थी, और उस वक़्त बस एक दुबली पतली लड़की ही थी। अल्लाह के नबी ﷺ ने साथ वाले लोगों से कहा: तुम लोग आगे निकल चलो। फ़िर मुझसे कहा: आओ मैं तुम से दौड़ लगाता हूं। लिहाज़ा हम ने दौड़ लगाई और मैं ऐसा दौड़ी कि आप से आगे निकल गई। इस पर आप ﷺ ख़ामोश रहे।
फ़िर एक ज़माना गुज़र गया और मैं बदन में भारी हो गई और इस बात को भी भूल गई। फ़िर एक सफ़र में आप ﷺ के साथ दोबारा निकली। आप ﷺ ने लोगों से कहा: तुम लोग आगे निकल जाओ। वो सब आगे रवाना हो गए। फ़िर आप ने मुझ से कहा: आओ, दौड़ लगाएं। इस पर मैं आप के साथ दौड़ी। लेकिन इस मर्तबा आप ﷺ मुझ से आगे निकल गए। और आप ﷺ खूब हंसे और कहा: ये उस मर्तबा के बदले है।"

📕 अबू दाऊद, मुस्नद अहमद
📕 सिलसिला अस्सहीहा 131


औ़रतें मर्दों की शक़ाइक हैं

आ़ईशा रज़िअल्लाहु अ़न्हा से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ से पूछा गया कि:
"एक शख़्स़ (नींद से जागने पर कपड़ों में) गीलापन देखे लेकिन उसे एह्तेलाम याद ना हो (तो वो क्या करे?) आप ने फ़रमाया: वो गुस्ल करले। फ़िर आप ﷺ से उस शख़्स़ के बारे में पूछा गया जिसे एह्तेलाम तो याद हो लेकिन वो तरी ना पाए। आप ﷺ ने फ़रमाया: उस पर गुस्ल नहीं है। इस पर उम्मे सुलैम रज़िअल्लाहु अ़न्हा ने कहा: अगर औ़रत भी इस त़रह़ (गीलापन) पाए तो क्या उस पर भी गुस्ल है? आप ﷺ ने फ़रमाया: हां, औ़रतें मर्दों ही की शक़ाइक हैं।"

📕 मुस्नद अहमद, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी - राविया: आ़ईशा
📕 अल बज़्ज़ार - रावी: अनस स़ही़ह़ अल जामे 2333


औ़रतों का इल्म की त़लब के लिए जमा होना

अबू सईद खुद्री रज़िअल्लाहु अ़न्हु फ़रमाते हैं:
"एक औ़रत अल्लाह के नबी ﷺ के पास आई और कहा: ऐ अल्लाह के रसूल, आप की बातें तो स़िर्फ़ मर्दों ही को सुनने मिलती हैं। लिहाज़ा आप कोई दीन हमारे लिए भी त़ै करें जिसमें हम आप की ख़िदमत में हाज़िर हों और जो इल्म अल्लाह ने आप को अ़त़ा फ़रमाया है उस में से हमें भी सिख़ाएं। इस पर आप ﷺ ने फ़रमाया: (ठीक है) तुम लोग फुलां दिन फुलां जगा जमा हो जाना। तो वो जमा हुवीं।"

अल्लाह के रसूल ﷺ उन के पास गए और आप ने उन्हें उस इल्म में से सिखाया जो अल्लाह ने आप को अ़त़ा फ़रमाया था। आप ﷺ ने फ़रमाया: "तुम में से जिस औ़रत ने अपने आगे तीन बच्चे भेजे हों वो बच्चे उस के लिए जहन्ऩम से बचाओ बन जाएंगे। एक औ़रत ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल, अगर दो बच्चे हों तो? दो मर्तबा उस औ़रत ने ये सवाल दोहराया। आप ﷺ ने जवाब में कहा: दो भी, दो भी, दो भी।"

📕 बुखारी: अल ऐतेस़ाम बिल क़िताब वस्सुऩ्ना 7310
📕 मुस्लिम: अल बिर् वस्सिलति वल अदब 4768


औ़रत का मस्जिद में आना

इब्ने उमर रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि;
"उमर रज़िअल्लाहु अ़न्हु की ज़ौजा (बिवी) मोहतरमा फ़ज़्र और इशा की नमाज़ मस्जिद में बाजमात अदा करती थीं। उन से किसी ने पूछा: आप क्यूं (नमाज़ के लिए) घर से बाहर निकलती हैं जब कि उमर रज़िअल्लाहु अ़न्हु इस को नापसंद करते हैं और उन्हें बड़ी गैरत आती है? इस पर उन्होंने जवाब दिया के: फिर वो मुझे मना क्यूं नहीं कर देते। (पूछने वाले) ने कहा के: उन्हें अल्लाह के रसूल ﷺ की ये बात रोक देती है कि: अल्लाह की बंदियों को अल्लाह की मस्जिदों से ना रोको।"

📕 बुखारी: अल जुमा 900


औरत और इल्मी तह़क़ीक़ व उलमा से सवाल

इब्ने अबी मुलैका से रिवायत है कि;
नबी ﷺ की ज़ौजा मोहतरमा आ़ईशा रज़िअल्लाहु अ़न्हा का मुआ़मला ये था कि जब भी वो नबी ﷺ से कोई बात सुनती और वो बात उन की समझ में ना आती तो उसे दोबारा दरियाफ़्त करती यहां तक की वो बात अच्छी तरह समझ में आ जाती। लिहाज़ा एक मर्तबा अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया: जिस का हिसाब लिया गया उसे अ़ज़ाब दिया जाएगा।

हज़रत आ़ईशा रज़िअल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं: मैं ने अ़र्ज़ किया: क्या अल्लाह तआ़ला ने यूं नहीं फ़रमाया कि: فَسَوۡفَ یُحَاسَبُ حِسَابًا یَّسِیۡرًا

(जिस शख़्स़ का आ़माल नामा उस के दाएं हाथ में दिया गया) उस से आसान हिसाब लिया जाएगा? (अल इनशिक़ाक़ 8)

इस पर आप ﷺ ने फ़रमाया: इस (आयत में हिसाब) से मुराद तो बस पेशी है। लेकिन जिस का हिसाब उधेड़ा गया वो हलाक हो जाएगा।

📕 बुखारी: अल इल्म 103
📕 मुस्लिम: अल जऩ्ना व स़िफ़ति नईमिहा व अहलिहा 5122


औ़रत और नमाज़े ईद

उम्मे अ़तिय्या फ़रमाती हैं: हमें इस बात का हुक्म दिया गया था कि हम ईदैन में हाएज़ा और पर्दानशीन (कुंवारी) ख़्वातीन को भी (ईदगाह) ले आएं ताकि वो मुसलमानों की जमात और उन की दुआ़ में शामिल हो जाएं। अलबत्ता हाएज़ा ख़्वातीन को नमाज़ की जगह (मुस़ल्ला) से अलग रहने के लिए कहा गया।

एक औ़रत ने अ़र्ज़ किया: "ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ, हम में से किसी के पास जिलबाब (पर्दा, चादर) नहीं होता है (तो क्या करें ?) आप ने फ़रमाया: उस की बहन अपने जिलबाब में उसे उढ़ादे।"

📕 बुखारी: अस्स़लात 351
📕 मुस्लिम: स़लातुल ईदैन 1475


नबी ﷺ के दौर में औ़रतों का फ़रमाने नबवी की ताबेदारी करना

अब्दुल्लाह बिन अ़म्र बिन आ़स़ रज़िअल्लाहु अ़न्हु फ़रमाते हैं कि:
"एक औ़रत अल्लाह के नबी ﷺ के पास आई और उसके साथ उसकी बेटी थी जिसके हाथों में सोने के मोटे मोटे कंगन थे। अल्लाह के नबी ﷺ ने उस से कहा: क्या तुम उसकी ज़कात देती हो? उसने कहा: नहीं। आप ﷺ ने फ़रमाया: क्या तुम्हें ये पसंद है कि क़ियामत के दिन उन की वजह से अल्लाह तआ़ला तुम्हें आग के कंगन पहनाए।

ये सुनकर उस औ़रत ने वो दोनों कंगन (अपनी बेटी के हाथों से) उतार दिये और अल्लाह के नबी ﷺ के आगे डाल दिये और कहा: ये अल्लाह के लिए है और उस के रसूल के लिए।"

📕 अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसाई
📕 अबू दाऊद बितह़क़ीक़िल अल्बानी 1563-ह़सन


शोहर के माल में से स़दका करने की गुंजाइश

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि; अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"एक औ़रत जब अपने शोहर की कमाई में से उसके हुक्म के बग़ैर (ख़ैर के कामों में) ख़र्च करती है तो उस को (यानी शोहर को) उसका आधा सवाब मिलता है।"

📕 बुख़ारी: अल बुयूअ़् 2066,
📕 मुस्लिम: अज़्ज़कात 1704


औ़रतों का जिहाद ह़ज है

उम्मुल मोमिनीन आ़ईशा रज़िअल्लाहु अ़न्हा से रिवायत है कि, उन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ से अ़र्ज़ किया:
"ऐ अल्लाह के रसूल, हम समझते हैं कि जिहाद सबसे अफ़ज़ल अमल है, फिर क्या हम भी जिहाद ना करें?
आप ﷺ ने फ़रमाया: नहीं, लेकिन सबसे अफ़ज़ल जिहाद ह़ज्जे मबरूर है।

एक रिवायत है कि फरमाती हैं:
"मैं ने अल्लाह के नबी ﷺ से जिहाद में जाने की इजाज़त चाही तो आप ने फ़रमाया: तुम औ़रतों का जिहाद ह़ज है।"

 📕 बुख़ारी: अल ह़ज 1520, अल जिहाद वस्सियर 2875:


निकाह़ के लिए औ़रत की भी इजाज़त ज़रूरी है

इब्ने अ़ब्बास रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"स़य्यिबा (यानी मुत़ल्लिका या बेवा औ़रत) वली के मुकाबले में अपने निकाह़ का ज़ियादा इख़्तियार रखती है। और कुंवारी से पूछा जाएगा और उस की ख़ामोशी ही उसकी त़रफ़ से इकरार है।"

और एक रिवायत के अ़ल्फ़ाज यूं है:
"सय्यिबा अपने बारे में अपने वली से ज़ियादा ह़क़ रखती है और कुंवारी से उसका बाप उस की इजाज़त लेगा। और उसका ख़ामोश रहना (यानी इनकार ना करना) ही उसकी त़रफ़ से इजाज़त है।"

 📕 मुस्लिम: अऩ्निकाह 2546


बेवजह तलाक़ चाहने वाली औरत का अंजाम

सौबान रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"जो भी औ़रत बिला किसी मजबूरी के अपने शोहर से तलाक़ का मुतालबा करती है उस पर जन्ऩत की खुश्बू ह़राम है।"

📕 मुस्नद अहमद, अबू दाऊद, इब्ने माजा,
📕 तिर्मिज़ी, इब्ने ह़िब्बान, ह़ाकिम
रावी: सौबान (स़ही़ह़ अल जामे 2706) (स़ही़ह़)


बालों में नक़्ली बाल जोड़ने की मनाही

आ़ईशा रज़िअल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं:
"एक अन्सा़री औ़रत ने अपनी बेटी का निकाह किया। (किसी मर्ज़ की वज़ह से) उसके बाल झड़ गए तो वो अल्लाह के रसूल ﷺ के पास आई और आप से ये बात बयान की और कहा कि उनके शोहर ने मुझसे कहा कि मैं उसके बालों में (और बाल) जोड़ दूं।

इस पर अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: नहीं, क्यूंकि (बाल) जोड़ने वालियों पर लानत की गई है।"

📕 बुख़ारी: अऩ्निकाह 5205,
📕 मुस्लिम: अल्लिबास वज़्ज़िना 3964


औरत के लिए घर से खुश्बू लगा कर निकलने की हुर्मत

अबू मूसा अश्अ़री रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया:
"जो भी औ़रत इत्र लगा कर लोगों के करीब से गुज़रती है ताकि वो उसकी खुश्बू मह़सूस करें तो ऐसी औ़रत ज़िनाकार औ़रत है और (उसकी ज़ीनत का मुशाहदा करने वाली) हर आंख ज़िनाकार है।"

 📕 मुस्नद अहमद, नसाई, हाकिम, इब्ने खुजैमा) रावी: अबू मूसा
 📕 स़ही़ह़ अल जामे 2701) (ह़सन) स़ही़ह़ इब्ने खुज़ैमा 1681
(इस की सनद ह़सन है) अल्फ़ाज़ इब्ने खुज़ैमा के हैं ।


जीनत की नुमाइश करने वाली औरत का अंजाम

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

"जहन्नमी लोगों की दो किस्में हैं जिन्हें मैंने नहीं देखा है। एक तो वो लोग होंगे जिन के हाथों में बैल की दुमों की त़रह़ कोड़े होंगे जिन से वो लोगों को मारेंगे।

और दूसरें वो औ़रतें हैं जो अगरचे लिबास पहने होंगी लेकिन ह़क़ीक़त में बरहना (नंगी) होगी। वो दूसरों को अपनी तरफ़ माएल करने वाली और खुद भी (गुमराही की तरफ़) माएल होंगी । उन के सरों का हाल बुख़्ती ऊंटों की माएल कोहानों की तरह होगा। वो ना जऩ्नत में दाख़िल होंगी और ना ही उस की खुश्बू पाएंगी हालांकि जऩ्नत की खुश्बू बहुत दूर से महसूस होती है।"

 📕 मुस्लिम: अल्लिबास वज़्ज़िनाह 3971
(अल जऩ्नति व स़िफ़ति नईमिहा व अहलिहा 5098)


किसी औरत की ज़ीनत का तज़्किरा शोहर से करना कैसा?

इब्ने मस्ऊद रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"कोई औ़रत अपने शोहर से किसी औ़रत की स़िफ़ात इस त़रह़ बयान ना करे कि गोया वो उस औ़रत को खुद देख रहा हो।"

 📕 बुख़ारी: अऩ्निकाह 4241, 4240


ग़ैर मेहरम औरत को छुना कैसा है?

माअ़्किल बिन यसार से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"तुम में से किसी के सर में लोहे की कील ठोक दी जाए ये बेहतर है बजाये इसके कि वो किसी औ़रत को छुवे जो उस के लिए ह़लाल ना हो।"

📕 त़बरानी; रावी: माअ़्किल बिन यसार
📕 स़ही़ह़ अल जामे 5045-स़ही़ह़


बग़ैर मेहरम से सफ़र व अजनबी से ख़लवत कैसा है?

इब्ने अ़ब्बास रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, उन्होंने अल्लाह के नबी ﷺ को यूं फ़रमाते सुना कि:
"कोई मर्द किसी (नामेहरम) औ़रत के साथ ख़लवत इख़्तियार ना करे (तन्हाई में न मिले), और कोई औ़रत मेहरम के बग़ैर सफ़र ना करे। (ये सुन कर) एक शख़्स़ खड़ा हुवा और कहा: ऐ अल्लाह के रसूल, मैंने अपना नाम फुलां ग़ज़्वे (जंग) में जाने के लिए लिखा दिया है और मेरी बीवी ह़ज के लिए जा रही है। (अब मैं क्या करूं ?)

आप ने फ़रमाया: "जाओ, अपनी बीवी के साथ ह़ज करो।"

📕 बुखारी: अल जिहाद वस्सियर 3006,
📕 मुस्लिम: अल ह़ज 2391

और एक रिवायत में आप ने फ़रमाया:
"ख़बरदार, जब भी एक मर्द किसी (ना मेहरम) औ़रत के साथ अकेला रहता है तो उन में तीसरा शैतान होता है।"

📕 मुस्नद अहमद, तिर्मिज़ी, हाकिम; रावी: उमर
📕 स़ही़ह़ अल जामे 2546-स़ही़ह़


घर की निगरानी और बच्चों की सरपरस्ती औ़रतों के ज़िम्मे है

अब्दुल्लाह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"तुम में से हर एक चरवाहा (सरपरस्त, निगरां) है और हर एक से उसके मातेह़तों के बारे में पूछ होगी। लिहाज़ा अमीर जो लोगों पर ज़िम्मेदार होता है, उस से उन के सिलसिले में पूछ होगी। आदमी अपने घर वालों पर निगरां है, उस से उन के सिलसिले में पूछ होगी, औ़रत अपने शोहर के घर और उसकी औलाद पर निगरां है उस से उन के सिलसिले में पूछ होगी। ख़बरदार, तुम में से हर एक निगरां है और हर एक से उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा।"

📕 बुख़ारी: अल इतक़ 2553,
📕 मुस्लिम: अल इमारा 3408



औरतों ने बच्चों को शरिअ़्त पर अ़मल करवाना

रूबय्यिअ़् बिन्ते मुअ़्वविज़ रज़िअल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं:
"अल्लाह के नबी ﷺ ने आ़शूरा की सुब्ह़ अन्सा़र की बस्तियों में (इस ऐलान के साथ) आदमी भेजा कि जिस ने आज इस हाल में सुब्ह़ा की कि वो रोज़ा नहीं था वो बक़िया दिन रोज़ा पूरा करे और जो आज रोज़दार था वो अपना रोज़ा जारी रखे।

फ़रमाती हैं: फ़िर हम ये रोज़ा रखा करते और अपने छोटे बच्चों को भी रोज़ा रखवाते। और हम उनके लिए कपास के खिलौने बना देते। जब उन में से कोई भूक की वजह से रोने लगता तो हम ये खिलौने उसे दे देते (ताकि बहल जाए) यहां तक कि इफ़्तार का वक़्त हो जाता।

📕 बुखारी: अ़स्सौ़म 1960,
📕 मुस्लिम: अस्स़ियाम 1919


कुत्ते को पानी पिलाने वाली औरत का क़िस्सा

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु फ़रमाते हैं कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"एक कुत्ता कुंवे के करीब चक्कर लगा रहा था और ह़ाल ये था कि प्यास से मर जाएगा। इस का ये ह़ाल बनी इसराइल की एक बदकार औरत ने देखा तो उसने अपने चमड़े का मोज़ा उतारा और (कुंवे में उतर कर) उसके लिए पानी निकाला और उसे पिलाया। अल्लाह तआ़ला ने उस की बस इस एक नेकी के बदले उसकी मग़फ़िरत कर दी।"

📕 बुखारी: अह़ादिसुल अंम्बिया 3467,
📕 मुस्लिम: अस्सलाम 4164


बिल्ली की मौत पर जहन्नम जाने वाली औरत का वाक़िआ

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़िअल्लाहु अ़न्हु फ़रमाते हैं कि, अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"एक औ़रत मह़ज़ एक बिल्ली की वजह से अ़ज़ाब दी गई। उसने उस बिल्ली को क़ैद कर के रखा यहां तक कि वो मर गई। लिहाज़ा वो इसी (गुनाह की) वज़ह से जहऩ्नम में गई। उसने उसे क़ैद कर के रखा तो ना उसे खुद खिलाया पिलाया ना उसे खुला छोड़ा कि वो खुद ही ज़मीन में कीड़ मकोड़े ही खाले।"

📕 बुखारी: अल मुसाक़ात 2365,
📕 मुस्लिम: अस्सलाम 4160


इबादत और हकूकुल इबाद वाली औरतों का अंजाम

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है, फ़रमाते हैं:
"एक शख़्स़ ने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ, एक औरत अपनी नमाज़, रोज़े और स़दकात की कसरत के लिए मशहूर है लेकिन वो अपनी ज़बान से अपने पडौसियों को तकलीफ़ देती है। अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: वो जहन्ऩमी है।

फिर उस ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ फुलां औरत अपनी (नफ़ल) नमाज़ों, रोज़ा और स़दकात की कमी के लिए मशहूर है और उस ने महज़ पनीर के टुकड़े स़दका किए हैं, लेकिन वो अपनी ज़बान से पडौसियों को तकलीफ़ नहीं देती। आप ﷺ ने फ़रमाया: वो औरत जन्ऩती है।"

📕 मुस्नद अहमद, इब्ने हिब्बान, हाकिम, बज़्ज़ार
📕 सहीह अत्तर्ग़ीब 2560-स़ही़ह़


पडोसन के तोहफे की क़द्र करना

अबू हुरैराह रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि, अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया:
"ऐ मुसलमान औरतों! कोई औ़रत अपनी पडौसन (के हदिये) को हकीर ना समझे चाहे वो हदिये में बकरी का खुर ही क्यूं ना दे।"

📕 बुखारी: अल हिबा व फ़ज़्लिहा वत्तह़रीजु अ़लैहा 2566
📕 मुस्लिम: अ़ज़्ज़कात 1711


नौहा (मातम) करने वाली औरतों का अंजाम

अबू मालिक अल अश्अ़री से रिवायत है कि, अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया:
"जाहिलियत की चार चीज़ें मेरी उम्मत में बाक़ी रहेंगी, वो उसे नहीं छोड़ेंगे। हसब पर फ़ख़्र करना, नसब पर ताअ़्न करना, सितारों से बारिश का अ़कीदा रखना, और (मय्यित पर) मातम करना। और आप ﷺ ने ये भी फ़रमाया: अगर मातम करने वाली औ़रत मरने से पहले तौबा ना करे तो कियामत के दिन वो इस हाल में उठेगी कि उस पर तारकोल का क़मीस़ होगा और खुजली का लिबास होगा।"

📕 मुस्लिम: अल जनाएज़ 1550


मुस़ीबत पर स़ब्र करने वाली जन्नती औरत

अ़त़ा बिन अबी रबाह़ से रिवायत है कि, मुझसे इब्ने अ़ब्बास रज़िअल्लाहु अ़न्हु ने फ़रमाया:
"क्या मैं तुम्हें एक जन्नती औरत ना दिखाऊं ! मैं ने कहा: ज़रूर। फ़रमाया: ये काली औ़रत,अल्लाह के नबी ﷺ के पास आई और कहा: ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ मुझे मिर्गी का दौरा पड़ता है और मैं इस हालत में बेपर्दा हो जाती हूं। आप अल्लाह से मेरे लिए दुआ़ करें।

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: अगर तुम चाहो तो स़ब्र करो तुम्हारे लिए जऩ्नत है और चाहो तो मैं तुम्हारे लिए अल्लाह से दुआ़ करता हूं कि वो तुम्हें शिफ़ा दे। उस औ़रत ने कहा: मैं स़ब्र ही कर लूंगी। फिर बोली: दौरे की हालत में मेरी बेपर्दगी हो जाती है। लिहाज़ा अल्लाह से इतनी दुआ़ कर दिजिए कि मेरी बेपर्दगी ना हो। इस पर अल्लाह के नबी ﷺ ने उस के लिए दुआ़ कर दी।"

📕 बुखारी: अल मर्ज़ा 5652
📕 मुस्लिम: अल बिर वस्स़िला वल आदाब 2576


सब्र दरअसल सदमे की इब्तिदा में होता है

साबित अल बुनानी रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं कि:

मैं ने अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु अ़न्हु को उनके घर की किसी ख़ातून से फ़रमाते सुना: क्या तुम फुलां औ़रत को जानती हो ? उन्होंने कहा: हां। फ़रमाया: अल्लाह के नबी ﷺ उस औ़रत के पास से गुज़रे जब वो क़ब्र के पास रो रही थी। (मुस्लिम की रिवायत में यूं है: वो अपने बच्चे की मौत पर रो रही थी)

आप ﷺ ने उस से कहा: अल्लाह से डरो, और स़ब्र करो। उस ने कहा: हटो यहां से, तुम्हें मेरी मुसीबत नहीं पहुंची।
फ़रमाते हैं: आप ﷺ ने उस से दरगुज़र का मुआ़मला किया और वहां से चले गए। उस औ़रत के पास से एक आदमी गुज़रा उस ने कहा: तुम से अल्लाह के रसूल ﷺ ने क्या कहा? वो बोली: मैं ने तो उन्हें पहचाना ही नहीं (कि वो अल्लाह के रसूल ﷺ हैं।)
उस ने कहा: वो अल्लाह के रसूल ﷺ ही थे। इस पर वो फ़ौरन आप ﷺ के दरवाज़े पर आई, उसे वहां कोई दरबान दिखाई नहीं दिया। बोली: ऐ अल्लाह के रसूल, अल्लाह की क़सम, में आप को पहचान नहीं पाई थी। इस पर नबी ﷺ ने फ़रमाया: स़ब्र दरअसल स़दमे की इब्तिदा ही में है।

📕 बुखारी: अल अह़काम 7154
📕 मुस्लिम: अल जनाएज़ 15 - 926

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जुमे का दिन | अहमियत, फ़ज़ीलत और आमाल ~ मुकम्मल जानकारी

जुमे की अहमियत, जुमे की फ़ज़ीलत और जुमे के दिन करनेवाले आमाल

۞ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम  ۞ 

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान बहुत रहमवाला है।

सब तारीफें अल्लाह तआला के लिए हैं जो सारे जहान का पालनहार है। हम उसी से मदद व माफी चाहते हैं,
अल्लाह की ला’तादाद सलामती, रहमते व बरकतें नाज़िल हों मुहम्मद सल्ल. पर, आप की आल व औलाद और असहाब रजि. पर।   व बअद -

जुमे के दिन की अहमियत 

यूं तो सब दिन अल्लाह तआला के बनाए हुए हैं। मगर जुमे के दिन की अहमियत को बयान करते हुए अल्लाह के रसूल सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फरमाया :

"अल्लाह तआला ने हम से पहले के लोगों को जुमे से मेहरूम रखा। चुनांचे यहूदियों के लिए सनीचर और ईसाईयों के लिए इतवार का दिन था। फिर अल्लाह हमें ले आया और उसने हमारी जुमे के दिन की तरफ रहनुमाई की। उसने (दिनों की तरतीब इस तरह बनाई कि) पहले जुमा, फिर सनीचर और उसके बाद इतवार। इसी तरह वह कयामत के दिन भी हमसे पीछे होंगे। हम दुनिया में आए तो आखिर में हैं लेकिन कयामत के रोज हम पहले होंगे और तमाम उम्मतों में सबसे पहले हमारा फैसला किया जाएगा।" (मुस्लिम-856) 

जुम्मा सबसे बेहतर दिन

🌷 "सबसे बेहतर दिन जिसका सूरज तुलूअ हुआ, जुमे का दिन है। इसमें आदम अलैहि. को पैदा किया गया। इसी में उन्हें जमीन पर उतारा गया। इसी दिन उनकी तौबा कुबूल की गई। इसी दिन उनकी वफात हुई और इसी दिन कयामत कायम होगी। हर जानदार जुमे के दिन सुबह से लेकर सूरज निकलने तक कयामत से डरते हुए उसके इन्तेजार में रहता है सिवाए जिन्न व इन्स के और जुमे के दिन एक वक्त ऐसा भी आता है कि ठीक उसी वक्त में जो बन्दा ए मुस्लिम नमाज़ पढ़ रहा हो और वह अल्लाह से जिस चीज़ का सवाल करे तो अल्लाह उसे वह चीज अता करता है। (अबुदाऊद-1046-सही) 

🌷 "तुम्हारे दिनों में सबसे अफजल जुमे का दिन है। इसी में आदम अलैहि. को पैदा किया गया इसी में उन पर मौत आई। इसी में सूर फूंका आएगा और इसी में जोरदार चीख की आवाज़ आएगी।" (अबुदाऊद-1046-सही)

🌷 "बेशक यह ईद का दिन है। जिसे अल्लाह ने सिर्फ मुसलमानों के लिए (ईद का दिन) बनाया है। लिहाजा जो शख्स नमाजे जुमा के लिए आए तो वह गुसल करे, खुश्बु हो तो जरूर लगाएं और तुम पर मिस्वाक करना लाजिम है।" (इब्ने माजा-1098-सही)

जुमे के दिन की फजीलत

"बेशक! जुमे का दिन तमाम दिनों का सरदार है और अल्लाह के नजदीक सबसे ज़्यादा अजमत वाला है। यह दिन अल्लाह के यहां ईदुल फितर और ईदुलजुहां से भी ज़्यादा फजीलत रखता है। 

इस दिन की पांच खुसूसियात है। 

👉 1. अल्लाह तआला ने इसी दिन आदम अलैहि. को पैदा किया। 

👉 2. इसी दिन उन्हें जमीन की तरफ उतारा। 

👉 3. इसी दिन उनकी वफात हुई। 

👉 4. इसमें एक घड़ी ऐसी है कि उसमें बन्दा अल्लाह से जिस चीज का सवाल करता है, अल्लाह उसे वह अता करता है बशर्ते कि वह हराम का सवाल न करें। 

👉 5. इसी दिन कयामत कायम होगी और मुकर्रिब फरिश्ते, आसमान, जमीन, हवाएं, पहाड़ और समन्दर सब के सब जुमे के दिन से डरते है।" (इब्ने माजा-1084-सही)


नमाजे जुमा 

जुमा की नमाज़ किस पर फ़र्ज़ है ?

जुमे के दिन सबसे अहम इबादत नमाजे जुमा है। यह हर मुकल्लिफ पर फर्ज है।

इस बारे में इर्शादे बारी तआला है- 

🌷 “ऐ ईमान वालों! जुमे के दिन जब नमाजे जुमा के लिए अजान कही जाए तो ज़िक्रे इलाही (नमाज) की तरफ दौड़कर आओ और खरीद व फरोख्त छोड़ दो। अगर तुम जानो तो यही तुम्हारे लिए बेहतर है।" (सूरह जुमा-आयत-9) 

और अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमाया :

🌷 "नमाजे जुमा अदा करना हर मुकल्लिफ मुसलमान पर हक व वाजिब है। सिवाए चार अफराद के 1. गुलाम 2. औरत 3. बच्चा और 4. मरीज ।" (अबुदाऊद-1067-सही)

इसी तरह मुसाफिर पर भी जुमा फर्ज नहीं हे और इस पर उम्मत का इज्माअ है। 

जुमा की नमाज़ जमात से पढ़ना फ़र्ज़ है 

नमाजे जुमा बा जमाअत अदा करना फर्ज है। इसे अकेला पढ़ना सही नहीं और जिस शख्स की नमाजे जुमा फौत हो जाए, वह जुहर की चार रकअत अदा करे। नमाजे जुमा बगैर किसी शरई उज्र के नहीं छोड़ना चाहिये । इसलिए कि :

🌷 "जो आदमी गफलत की वजह से तीन जुमे छोड़ दें, अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है।" (अबुदाऊद-1052-सही) 

🌷 और यह कि “लोग नमाजे जुमा छोड़ने से बाज आ जाएं। वरना अल्लाह तआला उनके दिलों पर मुहर लगा देगा। फिर वह गाफ़िलों में हो जाएंगे।'' (मुस्लिम-865) 

🌷 आप सल्ल. ने यह भी फरमाया कि "मेरा दिल चाहता है कि मैं एक आदमी को हुक्म दूँ कि वह लोगों को नमाज पढ़ाए। फिर मैं उन लोगों को उनके घरों समेत आग लगा दूं जो नमाजे जुमा से पीछे रहते है। (मुस्लिम-852)


आदाबे जुमा 

1. गुस्ले जुमा - 

यह गुसल अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हर बालिग पर वाजिब करार दिया है। लिहाजा इस दिन गुसल, सफाई, खुश्बू और अच्छे लिबास का एहतेमाम करना चाहिये। 

अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमाया :

🌷 "तुम में से कोई शख़्स जब जुमे के लिए आने का इरादा करे तो वह गुसल कर लें। (बुख़ारी-877, मुस्लिम-844)

🌷 " जुमे के दिन का गुसल हर बालिग पर वाजिब है। (बुख़ारी-879 मुस्लिम-846) 

2. खुश्बू लगाना (3.) गर्दनें न फलांगना 

🌷 "जो आदमी जुमे के दिन गुसल करें। अपनी ताकत भर पूरी तहारत करें तेल लगाए या अपने घर वालों की खुश्बू लगाए। फिर (मस्जिद में पहुंच कर) दो आदमियों को अलग-अलग न करे (यानि जहां जगह पाए वहीं बैठ जाए) फिर वह नमाज़ अदा करे जितनी उसके (मुकद्दर में) लिखी गई है। फिर जब इमाम खुत्बा दे तो वह खामोशी से सुने तो दूसरे जुमे तक उसके गुनाह माफ कर दिये जाते है।" (बुखारी-883) 

🌷 "जो शख़्स गुसल करें, फिर जुमे की नमाज़ के लिए आए और नमाज़ (नफिल) अदा करें जितनी उसके लिए मुकद्दर की गई है। फिर वह खतीब का खुत्बा खामोशी से सुनता रहे। फिर उसके साथ नमाजे जुमा अदा करे तो दूसरे जुमे तक उसके गुनाह माफ कर दिये जाते हैं और मजीद तीन दिन के भी।" (मुस्लिम-857) 

🌷 और यह कि “जिस शख्स ने जुमें के दिन गुसल कराया और खुद गुसल किया। नमाज के लिए अव्वल वक्त में आया और जुमे का खुत्बा शुरू से सुना। चलकर आया, सवार नहीं हुआ। इमाम के करीब बैठकर खुत्बा सुना और कोई फालतू (लगू) हरकत नहीं की तो उसे हर कदम पर एक साल के रोजों और एक साल के कयाम सवाब मिलेगा। (अबुदाऊद-345, इब्ने माजा-1087-सही)


जुमे के लिए जल्दी आने की फजीलत 

अहादीस का मफ़हूम है के :

👉 "जिस शख्स ने जुमे के दिन गुसले जिनाबत की तरह गुसल किया,
फिर वह जुमे की नमाज के लिए मस्जिद में चला गया तो उसने गोया एक ऊंट की कुर्बानी की,
👉 जो शख़्स दूसरी घड़ी में मस्जिद पंहुचा गोया उसने गाय की कुर्बानी की,
👉 और जो तीसरी घड़ी में पहुंचा, उसने गोया सींगोवाले एक मैंढ़े की कुर्बानी की,
👉 जो चौथी घड़ी में मस्जिद गया गोया उसने एक मुर्गी की कुर्बानी की
👉 और जो पांचवी घड़ी में गया गोया उसके एक अन्डे की कुर्बानी की।
फिर जब इमाम मिम्बर की तरफ चल निकले तो
फरिश्ते (मस्जिद में) हाज़िर हो कर जिक्र (खुत्बा) सुनते है।
(बुखारी-881 , मुस्लिम-850)

🌷 " जब जुमे का दिन आता है तो मस्जिद के हर दरवाजे पर फ़रिश्ते पहुंच जाते है जो आने वालों के नाम बारी-बारी लिखते हैं फिर जब इमाम मिम्बर पर बैठ जाता है तो अपने सहीफो को लपेट कर मस्जिद में आ जाते हैं और खुत्बा सुनते हैं।" (बुखारी-929)

अगर हम यह चाहतें हैं कि जुमे के दिन फरिश्ते अपने सहीफों में हमारा भी नाम लिखें तो हमें चाहिये कि इमाम के मिम्बर पर पहुंचने से पहले हम मस्जिद पहुंचे। तभी हमें कुर्बानी का भी सवाब मिलेगा।


तहयतुल मस्जिद का हुक्म 

जुमे की नमाज के लिए मस्जिद में पहुंचने के बाद सबसे पहला काम तहयतुल मस्जिद की अदायगी है। चाहे वह खुत्बा शुरू होने से पहले मस्जिद में आए या इमाम के खुत्बा शुरू करने के बाद। 

🌷 इसलिए कि आप सल्ल. का फरमान है "तुम में से कोई शख्स जब जुमे के दिन उस वक्त आए जब कि इमाम खुत्बा दे रहा हो तो वह दो रकअत नमाज अदा करे और उन्हें हल्का फुल्का पढ़े।" (मुस्लिम-875)

🌷 एक आदमी (सहाबी) जुमे के दिन उस वक्त मस्जिद में घुसा जब आप सल्ल. खुत्बा दे रहे थे। आप सल्ल. ने पूछा-क्या तुमने नमाज (तहयतुल मस्जिद) पढ़ी है? उस ने कहा-नहीं। तब आप सल्ल. ने फरमाया- "उठो! दो रकअत नमाज़ पढ़ो।" (बुखारी-931)

🌷 खत्बे के दौरान खामोश रहें: "जब तुमने जुमे के दिन इमाम के खुत्बे के दौरान अपने साथ बैठे हुए शख्स से यूं कहा कि खामोश रहो तो तुमने लगू हरकत की। (बुख़ारी-934, मुस्लिम-851)

🌷 "जिस शख्स ने जुमे के दिन गुसल किया और खुत्बे के दौरान कोई लगू हरकत नहीं कि तो उसका यह जुमा अगले जुमे तक उसके गुनाहों का कफ्फारा होगा। जिस शख्स ने बेहूदा हरकत की और लोगों की गर्दनों को फलांगा तो उसका यह जुमा नमाजे जुहर शुमार होगा।'' (अबुदाऊद-347-सही)

🌷 “जुमे की नमाज के लिए आने वाले लोग तीन तरह के होते हैं। एक वह शख्स है जो जुमे की नमाज के लिए आता है और इस दौरान वह बेहूदा बात या काम करता है तो उसे सिर्फ बेहूदगी ही मिलती है। 

दूसरा वह शख़्स है जो जुमे के लिए आता है और उसका मकसद सिर्फ दुआ करना होता है तो अल्लाह चाहे तो उसकी दुआ कुबूल करले और चाहे तो उसे रद्द कर दें। 

तीसरा वह आदमी है जो जुमे के लिए हाज़िर हो कर पुरसुकून रहता है। खामोशी और तवज्जोह के साथ खुत्बा सुनता है। किसी की गर्दन को नहीं फलांगता और न ही किसी को तकलीफ पहुंचाता है तो इसी शख्स का जुमा आने वाले जुमे तक बल्कि और तीन दिन उसके लिए कफ्फारा बनता है।” (अबुदाऊद-11 1 3-सही)


जुमे के दिन एक मुबारक घड़ी 

🌷 "जुमे के दिन एक घड़ी ऐसी आती है कि उसमें कोई मुसलमान बन्दा नमाज पढ़ रहा हो और अल्लाह से दुआ मांगे तो अल्लाह उसकी वह दुआ कुबुल करता है। (बुखारी-935, मुस्लिम-852) 

🌷 "वह (मुबारक घड़ी) इमाम के मिम्बर पर बैठने से नमाज़ खत्म होने के बीच रहती है। (मुस्लिम-853)

🌷 "तुम उसे अस्र की नमाज के बाद आखिरी घड़ी में तलाश करो।" (अबुदाऊद-1048-सही) 

इमाम इब्ने हजर अस्कलानी रह. ने फत्हुल बारी में इस बाबत उलैमा के 40 अकवाल दर्ज किये हैं। लेकिन ज़्यादार उलैमा इन्हीं दो तरफ गये हैं। 

इमाम इब्ने कय्यिम रह. ने इन्हीं दोनों अकवाल को राजेह करार दिया है क्योंकि यह दोनों सही अहादीस पर मब्नी हैं। अलबत्त्ता दूसरे कौल (असर के बाद) को ज़्यादा राजेह करार दिया है। (जादुल मआद-जिल्द। सफा-382)


नमाज़े जुमा के बाद सुन्नत नमाज़े 

🌷 "जो शख्स नमाजे जुमा के बाद नमाज पढ़ना चाहे तो चार रकअत पढ़े। अगर तुम जल्दी में हो तो दो रकअत मस्जिद में और दो रकअत घर लौटकर पढ़ लो।" (मुस्लिम-881) 

🌷 "इब्ने उमर रजि. जुमे की नमाज़ पढ़कर घर चले जाते थे और घर पर दो रकअत पढ़ते थे और कहते थे आप सल्ल. भी ऐसा ही किया करते थे।" (मुस्लिम-882) 


जुमा के मख़सूस आमाल 

1. जुमे के दिन को रोजे के लिए और उसकी रात को कयाम के लिए खास करना कैसा है ?

हफ्ते भर के दिनों में सिर्फ जुमे के दिन को रोजे के लिए और सिर्फ जुमे की रात को तहज्जुद के लिए खास कर लेना सही नहीं है क्योंकि ऐसा करने से आप सल्ल. ने मना किया है। 

🌷 “बाकी रातो को छोड़कर सिर्फ जुमे की रात को कयाम के लिए खास न करो। हां अगर कोई शख्स रोजा रखने का आदी हो और वह जुमे के दिन आ जाए तो (कोई हरज नहीं)" (मुस्लिम-1 144) 

🌷 "तुम में से कोई शख्स सिर्फ जुमे के दिन का रोजा न रखे। हां अगर उससे एक रोज पहले या उसके एक दिन बाद का भी रोजा रखे तो (कोई हरज नहीं) (मुस्लिम-1144, बुखारी-1985)

2. सूरह कहफ की तिलावत 

🌷 जिस शख्स ने जुमे की रात सूरह कहफ की तिलावत की तो उसके सामने उसके और खाना-ए-काबा के बीच दूरी के बराबर नूर आ जाता है।” (सही अल जामेअ-लिलबानी-6471) 

🌷 "जो शख़्स जुमे के दिन सूरह कहफ पढ़ता है तो उसके लिए अगले जुमे तक नूर ही नूर हो जाता है।” (सही अली जामेअ-6470)

3. नबी सल्ल. पर कसरत से दुरूद

अक्सर हजरात इसी कश्मकश में रहते है के जुम्मे के दिन क्या पढ़ना चाहिए? तो बहरहाल आपको बता दे :

🌷 इस दिन व रात में अल्लाह के रसूल सल्ल. पर ज्यादा से ज्यादा दुरूद पढ़ना चाहिये। 

क्योंकि आप सल्ल. ने फरमाया “तुम इस दिन मुझ पर कसरत से दुरूद पढ़ा करो। तुम्हारा दुरूद मुझ पर पेश किया जाता है।" सहाबा किराम रजि. ने कहा हमारा दुरूद आप पर कैसे पेश किया जाएगा? जबकि (कब्र में आपका जस्दे अतहर) तो बोसीदा हो जाएगा। आप सल्ल. ने जवाब दिया “बेशक! अल्लाह तआला ने जमीन पर अम्बिया के जिस्मों को खाना हराम कर दिया है।'' (अबुदाऊद-104-सही) 

🌷 “मेरी उम्मत का दुरूद मुझ पर हर जुमे को पेश किया जाता है। पस जो शख़्स मुझ पर ज़्यादा दुरूद पढ़ेगा, वह सबसे ज़्यादा मेरे करीब होगा।” (बैहकी-6089) 

🌷 “जो मुझ पर एक दफा दुरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाजिल करता हैं।'' (मुस्लिम-409) 

🌷 "जो शख़्स मुझ पर एक दफा दुरूद भेजता है तो अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल करता है, उसके दस गुनाह मिटा देता है और उसके दस दर्जात बुलन्द करता है।" (सही अल जामेअ-6359)

🌷 "जो शख्स सुबह के वक्त दस दफा और शाम के वक्त दस दफा मुझ पर दुरूद भेजता है, उसे कयामत के दिन मेरी शफाअत नसीब होगी।" (सही अल जामेअ-6357)


नमाजे जुमा कैसे पाई जा सकती है? 

नमाजे जुमा को पाने के लिए जरूरी है कि नमाजी इमाम के साथ कम से कम आखिरी रकअत पा ले। 

अगर वह आख़िरी रकअत नहीं पाता या वह इमाम के साथ दूसरी रकअत के रूकूअ के बाद शरीक होता है तो उसे इमाम के सलाम फेरने के बाद खड़े होकर सिर्फ दो रकअत नहीं बल्कि जुहर की चार रकअत पढ़नी होगी इसलिए के आप सल्ल. ने फरमाया :

🌷 "जो शख्स नमाजे जुमा की एक रकअत पा ले, वह उसके साथ एक रकअत को और मिलाए। (इब्ने माजा-1 1 21-सही)

🌷 "जो शख़्स नमाजे जुमा या किसी और नमाज की एक रकअत पा ले तो उसने नमाज (बा जमाअत) का सवाब पा लिया।'' (नसाई-557, इब्नेमाजा-1 1 23-सही) 

🌷 "जब तुम जुमे की एक रकअत को पा लो तो उसके साथ एक रकअत को और मिला लेना और जब तुम से (दूसरी रकअत का) रूकूअ भी छुट जाए तो तुम चार रकआत पढ़ना।'' (इब्ने अबिशैबा, तबरानी, बैहकी-सही)

🌷 "जब तुम्हें जुमे की एक रकअत मिल जाए तो तुम उसके साथ एक और रकअत मिला लेना। जब तुम इमाम के साथ तश्हुद में मिलो तो तुम चार रकआत पढ़ लेना।'' (बैहकी)

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें जुमे के दिन की बरकात से फायेदा हासिल करने की तौफीक दे । हमें अपने दीन की सीधी राह पर चलाए और हमें दुनिया व आख़िरत में कामयाबी नसीब फरमाए। आमीन्

आपका दीनी भाई जादुल खतीब

✒️ मुहम्मद सईद अज़-
✒️ डा. मुहम्मद इसहाक जाहिद
मो. 9214836639, 9887239649

Juma, Jumma, Jume ka Din, Namaz, Ahmiyat, Fazilat, Masail in Hindi

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