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हुजूर (ﷺ) का एक तारीख़ी फैसला



रसूलुल्लाह (ﷺ) की नुबुव्वत से चंद साल क़ब्ल खान-ए-काबा को दोबारा तामीर करने की जरुरत पेश आई। तमाम कबीले के लोगों ने मिल कर खान-ए-काबा की तामीर की, लेकिन जब हज्रे अस्वद को रखने का वक्त आया, तो सख्त इख्तिलाफ पैदा हो गया, हर कबीला चाहता था के उस को यह शर्फ हासिल हो, लिहाजा हर तरफ से तलवारें खिंच गई और क़त्ल व खून की नौबत आ गई।





जब मामला इस तरह न सुलझा, तो एक बूढ़े शख्स ने यह राय दी के कल सुबह जो शख्स सब से पहले मस्जिदे हराम में दाखिल होगा वही इस का फैसला करेगा। सब ने यह राय पसन्द की।





दूसरे दिन सब से पहले नबीए करीम (ﷺ) दाखिल हुए। आप को देखते ही सब बोल उठे "यह अमीन हैं, हम उन के फैसले पर राजी हैं।" आप (ﷺ) ने एक चादर मंगवाई और हज्रे अस्वद को उस पर रखा और हर क़बीले के सरदार से चादर के कोने पकड़वा कर उस को काबे तक ले गए और अपने हाथ से हज्रे अस्वद को उस की जगह रख दिया। इस तरह आप (ﷺ) के जरिये एक बड़े फितने का खात्मा हो गया।





📕 इस्लामी तारीख



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इंसान की हड्डियों में अल्लाह की कुदरत



अल्लाह तआला ने इंसानी जिस्म को हड्डी के ढांचे पर खड़ा किया है।





यह हड्डियाँ इंसानी जिस्म से कई गुना ज़ियादा वजन उठाने की सलाहियत रखती हैं। जब इन्सान क़दम उठाता है, तो उस की हड्डी पर जिस्म से कई गुना ज़ियादा वजन पड़ता है और कूल्हे की हड्डी तीन हजार किलो वजन उठाने की सलाहियत रखती है वह स्टील से जियादा मजबूत और उस से दस गुना ज़ियादा लचकदार और हल्की होती है। अगर यह हड्डियाँ भी स्टील की तरह वज़नी होती, तो उन का वजन हमारे लिये नाकाबिले बर्दाश्त हो जाता।





बेशक उन हल्की फुल्की हड्डियों में स्टील से जियादा कुव्वत व ताक़त पैदा फ़र्माना अल्लाह की जबरदस्त कुदरत है।





📕 अल्लाह की कुदरत



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हुजूर (ﷺ) गारे हिरा में



नुबुव्वत मिलने का वक़्त जितना करीब होता गया, उतना ही रसूलुल्लाह (ﷺ) तन्हाई को जियादा ही पसन्द करने लगे।





सबसे अलग हो कर अकेले रहने से आप को बड़ा सुकून मिलता था। आप अकसर खाने पीने का सामान ले कर कई कई दिन तक मक्का से दूर जाकर "हिरा" नामी पहाड़ के एक गार में बैठ जाते और इब्राहीमी तरीके और अपनी पाकीजा फितरत की रहनुमाई से अल्लाह की इबादत और जिक्र में मशगूल रहते थे।





अल्लाह की कुदरत में गौर व फिक्र करते रहते थे और क़ौम की बुरी हालत को देख कर बहुत गमजदा रहते थे, जब तक खाना खत्म न होता था, आप शहर वापस नहीं आते थे। जब मक्का की वादियों से गुजरते तो दरख्तों और पत्थरों से सलाम करने की आवाज़ आती। आप दाएँ बाएँ और पीछे मुड़ कर देखते, तो दरख्तों और पत्थरों के सिवा कुछ नज़र न आता था।





इसी ज़माने में आप (ﷺ) को ऐसे ख्वाब नज़र आने लगे के रात में जो कुछ देखते वही दिन में जाहिर होता था। यही सिलसिला चलता रहा के नुबुव्वत की घड़ी आ पहुँची और अल्लाह तआला ने आपको नुबुव्वत अता फ़रमाई।





📕 इस्लामी तारीख



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इताअत ऐ रसूल (ﷺ) की अहमियत



कुरआन में अल्लाह तआला फर्माता है :





“(ऐ नबी (ﷺ) ) आप कह दीजिए के अगर तुम अल्लाह तआला से मोहब्बत रखते हो, तो तुम लोग मेरी पैरवी करो। अल्लाह भी तुम से मुहब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाहों को बख्श देगा।”





📕 सूरह आले इमरान; ३१



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दावत व तबलीग़ का हुक्म



नुबुव्वत मिलने के बाद भी हुजूर (ﷺ) बादस्तूर गारे हिरा जाया करते थे। शुरू में सूरह अलक़ की इब्तेदाई पाँच आयतें नाज़िल हुईं, फिर कई दिनों तक कोई वहीं नाज़िल नहीं हुई। उस को "फतरतुल वह्य" का जमाना कहते हैं।





एक रोज़ आप गारे हिरा से तशरीफ ला रहे थे के एक आवाज़ आई, आप ने चारों तरफ घूम कर देखा, मगर कोई नजर नहीं आया। जब निगाह ऊपर उठाई,तो देखा के जमीन व आस्मान के दर्मियान हज़रत जिब्रईल (अ.) एक तख्त पर बैठे हुए हैं।





हज़रत जिब्रईल (अ.) को इस हालत में देख कर आप पर खौफ तारी हो गया और घर आकर चादर ओढ़ कर लेट गए। आप की यह अदा अल्लाह तबारक व तआला को पसंद आई और सूर-ए-मुदस्सिर की इब्तेदाई आयतें नाज़िल फ़रमाई।





"ऐ कपड़े में लिपटने वाले ! खड़े हो जाइये और (लोगों को) डराइये और अपने पर्दरदिगार की बड़ाई बयान कीजिए और अपने कपड़ों को पाक साफ रखिये और हर किस्म की नापाकी से दूर रहिये।"
[सूरह मुद्दस्सिर : १ ता ५]





इस तरह आप को दावत व तब्लीग का हुक्म भी दिया गया, चूँकि पूरी दुनिया सदियों से शिर्क व बुत परस्ती में मुब्तला थी और खुल्लम खुल्ला दावत देना मुश्किल था, इस लिये शुरू में पोशीदा तौर पर आपने इस्लाम की दावत देना शुरू की।





आपकी दावत से औरतों में सबसे पहले आपकी जौजा-ए-मुहतरमा हज़रत ख़दीजा ने, मर्दों में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (र.अ) ने और बच्चों में हजरत अली (र.अ) ने इस्लाम क़बूल किया।





📕 इस्लामी तारीख



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नजर लगने से हिफाजत



माशा अल्लाह की फ़ज़ीलत





रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :





“जिस शख्स ने कोई ऐसी चीज़ देखी जो उसे पसंद आ गई, फ़िर उस ने (माशा अल्लाह ! व लाहौल वला क़ूवता इल्लाह बिल्लाही) कह लिया, तो उस की नज़र से कोई नुक्सान नहीं पहुंचेगा।”





📕 कंजुल उम्मुल : १७६६६, अनस (र.अ)





तर्जुमा : जो कुछ अल्लाह चाहता है [होता है] और अल्लाह के अलावा कोई ताकत नहीं है।



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नजाशी के दरबार में कुफ्फार की अपील



कुरैश ने जब यह देखा के सहाबा-ए-किराम हबशा जा कर सुकून व इत्मीनान के साथ जिंदगी गुजार रहे हैं, तो उन्होंने मशविरा कर के अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन अबी रबीआ को बहुत सारे तोहफे देकर बादशाह हबशा के पास भेजा।





वहाँ का बादशाह ईसाई था। इन दोनों ने वहाँ जाकर तोहफे पेश किये और कहा के हमारे यहाँ से कुछ लोग अपने आबाई मजहब को छोड़ कर एक नया दीन इख्तियार कर के आपके मुल्क में भाग कर आ गए हैं. इस लिये उन को हमारे पास वापस कर दीजिए।





बादशाह ने मुसलमानों को बुला कर हक़ीक़ते हाल दरयाफ्त की। मुसलमानों की तरफ से हज़रत जाफर आगे बढ़े और कहा :
“ऐ बादशाह ! हम लोग जहालत व गुमराही में मुब्तला थे। बुतों की पूजा करते, मुरदार खाते थे और हम में से ताकतवर कमजोर पर जुल्म करता था। हम इसी हाल में थे के अल्लाह तआला ने हम पर फजल फ़र्मा कर एक रसूल भेजा, जिन की सच्चाई, अमानतदारी और पाकदामनी को हम पहले ही से जानते थे। उन्होंने हमें एक अल्लाह की इबादत करने, नमाज़, रोज़ा और जकात अदा करने और पड़ोसियों व रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करने का हुक्म दिया और जुल्म व सितम, खूरेजी और दूसरी बुरी बातों से रोका। हम उन बातों पर ईमान ले आए। इस पर हमारी कौम नाराज हो गई और हमें तकलीफें पहुंचाने लगी। तो फिर हम आपके मुल्क में आ गए हैं।





फिर हजरत जाफर ने सूरह मरयम की चंद आयतें पढ़ कर सुनाई। बादशाह पर इस का इतना असर पड़ा के आँख से आँसू जारी हो गए हत्ता के दाढ़ी तर हो गई और बादशाह ने कुफ्फारे कुरैश को यह कह कर दरबार से निकलवा दिया के मैं इन लोगों को हरगिज़ तुम्हारे हवाले नहीं करूँगा। सुभान अल्लाह





तफ्सील में यहाँ पढ़े : सीरतून नबी (ﷺ) नजाशी का का दरबार





📕 इस्लामी तारीख



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जन्नत का मौसम



कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है :





“उन (अहले ईमान) के सब्र के बदले में (उन्हें) जन्नत और रेशमी लिबास अता किया जाएगा, उन की यह हालत होगी के जन्नत में मसेहरियों पर तकिये लगाए बैठे होंगे, वहाँ उन्हें न गर्मी का एहसास होगा और न वह सर्दी महसूस करेंगे।”





📕 सूरह दहर : १२ ता १३



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हजरत रुकय्या बिन्ते रसूलुल्लाह (र.अ)



हज़रत रुकय्या (र.अ) हुजूर (ﷺ) की दूसरी साहबज़ादी (बेटी) थीं, वह पहले अबू लहब के बेटे उत्बा के निकाह में थीं, जब हुजूर (ﷺ) को नुबुव्वत मिली और लोगों को दावत देना शुरू किया, तो अबू लहब के हुक्म पर उत्बा ने हजरत रुकय्या (र.अ) को तलाक दे दी, फिर हज़रत उस्मान (र.अ) से उनका निकाह हुआ, उनसे एक लड़का अब्दुल्लाह पैदा हुए।





हजरत रुकय्या (र.अ) हजरत उस्मान (र.अ) के साथ हब्शा हिजरत कर गई, हिजरत के वक्त हुजूर (ﷺ) ने फ़र्माया: इस उम्मत में सबसे पहले हिजरत करने वाले उस्मान (र.अ) और उन की अहलिया है। कुछ अर्से बाद दोनों हब्शा से मक्का आए और फिर हिजरत कर के मदीना आ गए।





ग़ज़व-ए-बद्र के मौके पर हजरत रुकय्या (र.अ) बहुत बीमार हो गई थीं, इस लिए हुजूर (ﷺ) ने हजरत उस्मान (र.अ) को उन की तिमारदारी के लिए रोक दिया था और उसी बीमारी में सन २ हिजरी में हज़रत रुकय्या (र.अ) का इन्तेकाल हो गया, जंगे बद्र में शिरकत की वजह से हुजूर (ﷺ) उन की नमाजे जनाजा में शरीक न हो सके। यह जन्नतुल बकी में मदफून हुई।





📕 इस्लामी तारीख



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दुनिया में खुद को मशगूल न करो



रसुलअल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :





“तुम में से कयामत के दिन मुझ से ज़ियादा करीब वह शख्स होगा, जो दुनिया से उसी तरह निकल आए, जिस तरह में छोड़ कर जा रहा हूँ; अल्लाह की कसम! मेरे सिवा तुम में से हर एक दुनिया की किसी न किसी चीज़ में फंसा हुआ है।”





📕 मुस्नदे अहमद ; २०९४७



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अल्लामा अब्दुर्रहमान बिन जौज़ी (रह.)



छटी सदी हिजरी में अब्दुर्रहमान बिन जौज़ी (रह.) एक बहुत बड़े मुहद्दिस, मोअरिंख, मुसन्निफ और खतीब गुजरे हैं।





सन ५०८ हिजरी में बगदाद में पैदा हुए, बचपन में बाप का साया सर से उठ गया और जब पढ़ने के काबिल हुए. तो माँ ने मशहूर मुहदिस इब्ने नासिर (रह.) के हवाले कर दिया और आप ने बड़ी मेहनत और शौक के साथ अपना तालीमी सफ़र शुरु किया।





वह खुद फ़र्माते हैं के मैं छे साल की उम्र में मकतब में दाखिल हुआ, बड़ी उम्र के तलबा मेरे हम सबक थे।





मुझे याद नहीं के मैं कभी रास्ते में बच्चों के साथ खेला हूँ या ज़ोर से हंसा हूँ। आपको मुताले का बड़ा गहरा शौक था, वह खुद बयान करते हैं के जब कोई नई किताब पर मेरी नज़र पड़ जाती तो ऐसा मालूम होता के कोई खज़ाना हाथ आ गया।





आपकी वफात सन ५९७ हिजरी में बगदाद में हुई।





📕 इस्लामी तारीख



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औरतों का खुशबु लगाकर बाहर निकलने का गुनाह



रसुलअल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :





“जो औरत इत्र लगा कर लोगों के पास से गुजरे, ताके लोग उस की खुश्बू महसूस करें, तो वह ज़ानिया है और हर (देखने वाली) आँख जिनाकार होगी।”





📕 तिर्मिज़ी : २७८६, अबी मूसा (र.अ)





ज़ानिया: जीना करने वाली खातून



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मुस्लिम बेहनों के लिए कुरआन सुन्नत से 50 नसीहतें…



मुस्लिम बेहनों के लिए कुरआन सुन्नत से 50 नसीहतें





बिस्मिल्लाहिरहमानिर्रहीम! अल्हम्दुलिल्लाह वस्सलातु वसल्लामु अला रसूलिल्लाहि (ﷺ)





ऐ मुस्लिम बहन! मुस्लिम का मतलब होता है, अल्लाह का फर्माबरदार (आज्ञाकारी) होना. इस्लाम में यह ज़िम्मेदारी मर्द व औरत दोनों पर एक समान रूप से लागू है या'नी इसमें कोई जिन्सी (लैंगिक) भेदभाव नहीं है. इस लेख में कुरआन व सहीह हदीसों की रोशनी में 50 अहमतरीन नसीहतों का ज़िक्र किया गया है, अगर इन पर अमल किया जाए तो औरत अल्लाह की नेक बन्दी बनने के साथ-साथ समाज में इज्जत और वकार (सामाजिक प्रतिष्ठा) भी पा सकती है।





लेकिन ये बेहद अफ़सोस की बात है कि आधुनिकता और नारी-स्वतंत्रता के नाम पर औरतों को आवारगी और गुमराही की तरफ धकेला जारहा है. वैसे तो ये नसीहतें हर औरत के लिये मुफ़ीद (लाभप्रद) हैं. लेकिन हिदायत की रोशनी से महरूम (वंचित) और दुनियवी चकाचौंध में अंधी हो चुकी जदीद तालीमयाफ्ता (आधुनिक शिक्षा प्राप्त) कुछ औरतों को ये नसीहतें 'बोझल, दकियानूस और मर्दवादी लग सकती हैं।





जब आज़ादी का मतलब, आवारगी समझा जाने लगे तो इंसान सोचने-विचारने की ताक़त खो देता है. यह लेख औरतों से गुज़ारिश (निवेदन) करती है कि जवानी की चकाचौंध के पीछे छुपे बुढ़ापे के घनघोर अंधेरे को देखें जो दबे पाँव उनकी ओर बढ़ रहा है, ये तो सिर्फ दुनियावी नुकसान की बात है जिसकी अभी भी भरपाई हो सकती है लेकिन आख़िरत के दिन अफ़सोस करना भी कोई काम नहीं आएगा।





मुस्लिम लड़कियों की पहचान





बात करने के आदाब





01. फ़िजूल और ज़्यादा बातें करने से बचना : 





कुरआन मजीद का इरशाद, 'लोगों की ख़ुफ़िया सरगोशियों में अक्सर व बेशतर कोई भलाई नहीं होती। हाँ अगर कोई पोशीदा तौर पर सदक़ा व खैरात करे या किसी नेक काम की तल्कीन करे या लोगों में सुलह कराने के लिये (मश्वरा वगैरह कर ले)।’





(सूरह निसा :114





ऐ मुस्लिम बहन! आपको इल्म होना चाहिये कि आपकी हर बात को लिखने वाले और उसे नोट करने वाले हर वक़्त मौजूद हैं, अल्लाह तआला का फरमान है : ‘एक दायें तरफ और एक बायें तरफ बैठा हुआ है। तुम जो बात भी मुँह से निकालते हो, उस पर निगरान मौजूद है।’  





(सूरह काफ़:17-18)





इसलिये बेहतर है कि आप जो बात करें बड़ी मुख़्तसर (छोटी), बा-मानी (सार्थक) और बामकसद हो और जो बात मुंह से निकालें सोच-समझ कर निकाले! 










02. कुरआन करीम की तिलावत करना : 





कोशिश ये हो कि हर रोज़ कुरआन की तिलावत की जाये, कुरआन पढ़ना आपका रोज़ाना का मामूल बन जाना चाहिये। और ये भी कोशिश करें कि जितना हो सके उतना ज़बानी हिफ़्ज़ किया जाये ताकि क़यामत के रोज़ अज्रे  अज़ीम, आला दर्जात और बेहतरीन मक़ाम से नवाजा जाए। 





हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि.) बयान करते हैं कि नबी अकरम (ﷺ) का इरशादे गिरामी है, “साहिबे कुरआन को कहा जायेगा कि (ठहर ठहर कर) तरतील से पढ़ता जा और चढ़ता जा और इसी तरह कुरआन की तिलावत करता जा जैसे दुनिया में (ठहर-ठहर कर) किया करता था, तेरी मंज़िल वहाँ होगी जहाँ तेरी आख़री आयत की तिलावत होगी।”





(अबू दाऊद: 1464) 





03. हर सुनी हुई बात को बयान न करना : 





ये अच्छी बात नहीं कि आप जो कुछ सुनें उसे आगे बयान करें, हो सकता है उसमें कुछ झूठ की मिलावट हो। 





हज़रत अबू हुरैरह (रजि.) बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फर्माया “आदमी के लिये यही झूठ काफ़ी है कि हर सुनी बात को बयान करे।”





(सहीहूल जामे सगीर: 4482) 





04. बड़ाई बयान करने से बचना : 





फक्रिया कलिमात (गीली बातें) कहना और बड़ाई बयान करना और जो चीज़ आपके पास नहीं उसको अपनी मिल्कियत ज़ाहिर करना। अपनी ज़ात को ऊँचा दिखाने और लोगों की नज़रों में बड़ा बनने के लिये कोई अल्फ़ाज़ इस्तेमाल न करें।





उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका (रजि.) बयान करती हैं कि एक औरत ने कहा, “ऐ अल्लाह के रसूल (ﷺ)! किसी को बताऊँ कि ये चीज़ मेरे ख़ाविंद ने दी है जबकि उसने नहीं दी होती तो क्या ऐसा कहने में कोई हर्ज है?” तो अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फर्माया, “वो ऐसा है जैसा कोई बनावटी कपड़े पहनने वाला हो।” (यानी ये धोखा है, फरेबकारी है)। 





(बुखारी:5219, मुस्लिम:5705) 





05. अल्लाह का ज़िक्र करते रहना :





ऐ मुस्लिम बहन! हर वक़्त अल्लाह का जिक्र करती रहा करो। अल्लाह के ज़िक्र से हर मुस्लिम के लिये बहुत से रूहानी, शख़्सी, नफ़्सी, जिस्मानी और इज्तिमाई फायदे हैं। किसी हालत और किसी वक्त में भी अल्लाह के जिक्र से गाफिल न रहना, अल्लाह तआला ने अपने मुख्लिस और अक्लमंद बन्दों की तारीफ़ करते हुए फर्माया, “वो अल्लाह तआला का ज़िक्र खड़े, बैठे और अपनी करवटों पर लेटे हुए करते हैं।”





(सूरह आले इमरान:191





हज़रत अब्दुल्लाह बिन बसर अल मुज़ाज़नी (रजि.) बयान करते हैं कि एक आदमी ने अल्लाह के रसूल (ﷺ) से कहा कि इस्लाम के उमूर बहुत हो गये हैं तो मुझे कुछ मुख्तसर (संक्षिप्त) चीज़ बता दें ताकि मैं उसी पर अमल करता रहूँ, तो आप (ﷺ) ने फर्माया, “तेरी ज़बान हर वक़्त अल्लाह के ज़िक्र में मश्गूल रहनी चाहिये।”





(तिर्मिज़ी: 3375, इब्ने माजा: 3793) 





06. बात करने में फक्र करना: 





जब भी किसी से बात करना हो तो गुरूर से बचकर बुरे अल्फाज़ और तीखे लहजे में बातचीत न करना। ये तरीका और ये आदत अल्लाह के रसूल (ﷺ) के नज़दीक नापसंदीदा है। जैसा कि रसूलुल्लाह (ﷺ) का फर्मान है, “क़यामत के दिन तुममें से सबसे नापसंदीदा मेरे नज़दीक वो होंगे जो बहुत बातूनी, बेतुकी, बनावटी और फक्रिया  तकब्बुर की बातें करने वाले होंगे।” 





(तिर्मिज़ी:1642)





07. ख़ामोशी इख़्तियार करना 





ऐ मेरी बहन! आपकी ज़ात में अल्लाह के रसूल (ﷺ) की आदते मुबारका की झलक मिलनी चाहिये। ख़ामोशी ज़्यादा इख्तियार करना, गौर-फ़िक्र करना और कम हँसना।





हज़रत सम्माक (रह.) फरमाती हैं कि मैंने हज़रत जाबिर बिन समुरह (रजि.) से पूछा, ‘क्या आपका अल्लाह के रसूल (ﷺ) की मजलिस में बैठना हुआ?' फ़र्माया, 'हाँ! आप (ﷺ) बहुत ज़्यादा ख़ामोशी इख़्तियार करते, कम हँसते, आपके अस्हाबे किराम (रजि.) कभी कोई दिलचस्प बात किया करते तो हँस लिया करते और कभी-कभार मुस्कुरा देते।' 





(मुस्नद अहमद : 5/68)





अगर बात करना चाहो तो बड़े सलीके और नर्मी से, भलाई और खैरख्वाही की बात करें वर्ना ख़ामोशी बेहतर है। ये भी अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने ही सबक दिया है, फर्माया, 'जो अल्लाह और क़यामत पर यकीन रखता है उसे चाहिये कि वो खैर की बात करे या फिर खामोश रहे।'





(बुखारी : 6018) 





08. किसी की बात को काट देना : 





बात करने वाले की बात काटने से रुक जायें और अगर किसी को जवाब देने का मौका मिले तो बड़े रूखेपन, उसकी हतके इज्ज़त (मानहानि) या उसका मजाक उड़ाने के अंदाज में जवाब न दें। 





हर एक की बात बड़े अदब और ध्यान से सुनें और अगर जवाब देना पड़े तो बड़ी अच्छे अंदाज और नर्म लहजे में जवाब दें। खुशी और नमी के अंदाज़ में जवाब देने से आपकी शख्सियत से एक अच्छे इंसान की शख्सियत का इज़हार होगा।





09. बात करने में किसी की नक़ल उतारना :





बातचीत के दौरान किसी का मज़ाक़ उड़ाने से पूरी तरह बचें। अगर कोई बेचारी औरत बात सही ढंग से नहीं कर सकती, किसी की ज़बान अटकती है या किसी की ज़बान में रवानी नहीं तो उसकी नक़ल उतारने या उसका मज़ाक़ बनाने की कोशिश नहीं करें। 





अल्लाह रब्बुल इज्जत का फरमान है, 'ऐ ईमान वालों! मर्द दूसरे मर्दो का मजाक न उड़ायें मुमकिन है कि वे उनसे बेहतर हों, और औरतें दूसरी औरतों का मज़ाक़ न उड़ायें मुमकिन है कि वे उनसे बेहतर हों।'





(सूरह हुजुरात :11)





रसूलुल्लाह (ﷺ) का फर्मान है, 'मुस्लिम, मुस्लिम का भाई है। वो उस पर जुल्म नहीं करता, न उसको जलील (अपमानित) करता है और न उसे हक़ीर (नीच) जानता है। किसी आदमी के बुरा होने की इतनी निशानी काफ़ी है कि वो अपने मुस्लिम भाई को हक़ीर जाने।' 





(मुस्लिम : 2564) 





10. तिलावत ख़ामोशी से सुनना:





जब कुरआन करीम की तिलावत हो रही हो तो अल्लाह सुबहानहू व तआला के कलाम का अदब करते हुए हर किस्म की बातचीत से रुक जाना चाहिये जैसा कि अल्लाह रब्बुल इज्जत का फरमान है, 'और जब कुरआन पढ़ा जा रहा हो तो उसकी तरफ़ कान लगाकर सुनो और खामोश रहा करो! उम्मीद है कि तुम पर रहमत हो।' 





(सूरह आराफ़: 204





11. बात करने से पहले सोचें: 





बात करने से पहले पूरी तरह सोच लें। ऐसा न हो कि आपकी जुबान से जल्दी में ग़लत और पकड़ किये जाने लायक बात निकल जाये। ये कोशिश करें कि जुबान से बड़ी नर्म, मुनासिब और अच्छी बात ही निकले। तीखी, टेढ़ी, उल्टी-सीधी और सख्त बात न निकलने पाये जो अल्लाह सुबहानहू तआला की नाराज़गी का कारण बन जाये।





        जुबान के कलिमात के बड़ी अहमियत है। कितने ही ऐसे इंसान हैं जिन्होंने अपनी ज़बान से चंद कलिमात निकाले तो उनके और पूरे समाज के लिये मुसीबत का सबब बन गये। इसी तरह कितनी ही ऐसा बातें हैं जिनकी अदायगी से इंसान जन्नत का हकदार बन गया और कितनी ही ऐसी बातें हैं जिनकी अदायगी से जहन्नम के गड्ढे में जा गिरा। 





हज़रत अबू हुरैरह (रजि.) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया, 'कई बार इंसान अल्लाह की रजामंदी की बात करता है जिसकी अहमियत का उसे एहसास नहीं होता, लेकिन अल्लाह मालिकुल मुल्क उसकी वजह से उसके दर्जात बुलन्द कर देता है और कई बार वो अपने मुँह से अल्लाह की नाराजगी का ऐसा कलिमा निकालता है जिसके अंजाम का तो उसको इल्म नहीं होता लेकिन उसकी वजह से वो जहन्नम में चला जाता है।





(बुखारी : 6478)





हज़रत मुआज़ बिन जबल (रजि.) बयान करते हैं कि नबी अकरम (ﷺ) ने कहा, 'क्या मैं तुझे तमाम नेकियों की जड़ न बताऊँ?' मैंने अर्ज़ किया : 'हाँ ज़रूर! ऐ अल्लाह के रसूल!' आप (ﷺ) ने अपनी जुबान मुबारका को पकड़ा और फ़रमाया, 'इसको रोके रख (यानी ज़बान की हिफ़ाज़त करते रहना)' मैंने अर्ज किया, 'ऐ अल्लाह के रसूल(ﷺ)! क्या हम अपनी बातों की वजह से पकड़े जायेंगे?' आप (ﷺ) ने फर्माया, 'तुम्हारी माँ तुम्हें गुम पाए ज़्यादातर लोग अपनी ज़बानों की वजह से औंधे मुँह जहन्नम में डाले जायेंगे।'





(तिर्मिज़ी: 2616, इब्ने माजा : 3973)





12. अपनी ज़बान नेकी के लिये इस्तेमाल करें : 





अपनी जुबान का इस्तेमाल ज़रूर करें क्योंकि ये अल्लाह की बहुत बड़ी नेमत है। लेकिन 'अम्र बिल्मअरूफ़ और नहीअनिल मुन्कर (भलाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने)' के लिये। अल्लाह तआला का फरमान है, 





'लोगों की सरगोशियों में अक्षर व बेश्तर कोई भलाई नहीं होती मगर जिसने सदक़ा करने का हुक्म दिया या नेक काम करने का या लोगों के बीच इस्लाह करने का हुक्म दिया, तो उन चीज़ों में भलाई और फायदा है।' 





(सूरह निसा :114)










इल्म सीखने की अहमियत





13. इल्म सीखना एक अच्छा काम और बाइज्जत रास्ता है : 





शिफा बिन्ते अब्दुल्लाह (रजि.) बयान करती हैं कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) हमारे पास तशरीफ़ लाये उस वक्त में उम्मुल मोमिनीन हफ्सा (रजि.) के पास थी कि आप (ﷺ) ने मुझे फ़रमाया, 'तू उसे ज़ख़्मों पर पढ़ने का दम क्यों नहीं सिखा देती जैसे तूने उसे लिखना (किताबत करना) सिखाया।' 





(अहमद, अबू दाऊद : 3887) 





14. इल्मे दीन को समझने व समझाने के लिये सीखें: 





इल्म सीखने का मतलब ये नहीं है कि आपके पास कोई सर्टिफिकेट ही हो जो किसी ओहदे, आला नौकरी या नाम के लिये हासिल करना लाज़मी समझा जाता है। नहीं! बल्कि दीने इस्लाम को उसके अहकाम के साथ जानने के लिये, कुरआन को बेहतर से बेहतर तरीके से पढ़ने की मालूमात होना इल्म है, यह इसलिए ज़रूरी है कि कम से कम अपने रब की इबादत मुकम्मल बसीरत के साथ की जा सके।





तालीम हासिल करने का मतलब ही यही है कि एक औरत अपनी और अपनी औलाद वगैरह की तरबियत उस सहीह मनहज के मुताबिक़ कर सके जो मनहज अल्लाह सुब्हानहू व तआला के प्यारे रसूल (ﷺ) का है और उसी पर उनके सहाब-ए-किराम (रजि.), ताबिईन इज़ाम और सालेहीन अज्मन (रहि.) ने सीधी और महफूज़ (सुरक्षित) राह पाने के लिये अमल किया। 





15. किसी कम इल्म वाले का मज़ाक़ न उड़ायें: 





किसी ऐसी बहन का मजाक न उड़ायें जो पढ़ना-लिखना नहीं जानती और न ही अपने आपको इल्म में बेहतर और दूसरी को कमतर समझें बल्कि दूसरी बहन के साथ तवाजुहू और नर्मी से पेश आएं। नर्मी का तरीका इख़्तियार करना दूसरों की नज़रों में इज्जत व वक़ार को बुलन्द करने में आपका मुआविन (मददगार) साबित होगा। 





आपका सख्त रवैया आपके इल्म के लिये वबाल बन जायेगा। कअब बिन मालिक (रजि.) बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (ﷺ) से सुना कि आपने इर्शाद फरमाया, 'जिसने इल्म इसलिये सीखा कि वो बेवकूफों से झगड़ा करे या उलमा से फक्र करे (बरतरी दिखाने के लिये) और लोगों का मुँह फेर देने के लिये वो जहन्नम में जायेगा।’





(सुनन दारमी : 373, इब्ने माजा : 253) 





16. गाना सुनना जायज नहीं: 





ऐ मेरी बहन! गाने और मौसिकी के करीब न जा। अपना यही वक़्त अल्लाह के ज़िक्र और तिलावते कुरआन में लगा ले। इससे सवाब भी होगा और दिली इत्मीनान व सुकून भी नसीब होगा। ऐ मेरी बहन! अपनी सुनने की ताकत को, अपने कानों को गाने, संगीत और फ़हश (अश्लील) बातों से पाक रख। गाना, जुबान और कानों की आफ़तों में से बड़ी आफत है।





मौजूदा ज़माने में मुस्लिमों की अक्सरियत इस आफत से दो-चार है जिसकी वजह से दिलों को परेशानी, बेचैनी, मायूसी,अल्लाह के ज़िक्र से एराज़, उसकी किताब की तिलावत के लिये वक़्त न मिलने की वजह से दिलों में सख्ती आ चुकी है। लोगों से दूरी और नफरत ज्यादा होती चली जा रही है। यही वजह है कि एक बंदे के दिल से गैरत कम होती चली जा रही है। 





उलमा-ए-किराम का फरमान है कि गाना बजाना, ज़िना पर उभारने वाला है, ये बदकारी का पैग़ाम है, शैतान की अज़ान है। गाना दिलों में निफ़ाक़ पैदा करता है, बुरे खात्मे और बुरे अंजाम की तरफ ले जाता है। जिंदगी के आखिरी लम्हों को भलाई से बेगाना बना देता है। 





अल्लाह रब्बुल इज्जत का फ़र्मान है, 'और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो लग्वी बातों को मोल लेते हैं ताकि लाइल्मी में अल्लाह की राह से लोगों को बहकायें।'





(सूरह लुकमान: 6





हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रजि.) फरमाते हैं, 'लहवल हदीष’ का मतलब गाना बजाना है। अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया, 'मेरी उम्मत में कुछ लोग होंगे जो बदकारी, रेशम, शराब और नाच-गाने को हलाल समझेंगे।'





(बुखारी :5590) 










लिबास (ड्रेस) के आदाब





17. बारीक व तंग लिबास न पहने : 





ऐ मुस्लिम बहन! आप मुसलमान हैं, इसलिए आपका लिबास हमेशा शरीयत के दायरे में होना चाहिए। आपका लिबास न इतना बारीक हो कि जिन अंगों को छुपाना चाहिये वे नज़र आएं और न इतना टाइट (फिट) हो कि कपड़े पहने हुए होने के बावजूद जिस्म का कोई हिस्सा उभरा हुआ दिखाई दे। 





18. बगैर आस्तीन का लिबास न पहनें: 





ऐ मुस्लिम बहन! जिस स्लीवलेस (बगैर आस्तीन) और बड़े गले के कुर्ते को आजकी औरतें फैशन समझकर पहनने में कोई हर्ज महसूस नहीं करतीं वो आपके लिये शरीअत के एतबार से सहीह नहीं है। ऐसे कपड़े सतर डाँकने के बजाय नंगेपन को जाहिर करते हैं। इसके साथ ही आपको ऐसे कपड़े भी नहीं पहनने चाहिए जो मर्द पहनते हैं।





एक हूदीष में अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने उन मदों पर लानत की है जो औरतों जैसे कपड़े पहनते हैं और उन औरतों पर भी ला'नत की हैं जो मदों जैसा लिबास पहनती हैं। 





(सुनन अबू दाऊद : 4098)










इज्तिमाआत के आदाब





19. बुरी मजलिस से बचना : 





ऐ मुस्लिम बहन! अल्लाह आपकी हिफ़ाज़त फरमाए। बुरी मजलिसों में शिर्कत से अपने आपको दूर रखो और जितनी मुमकिन हो सकता है अच्छी महफ़िलों और अच्छी इल्म जानने वाली, बाअख़्लाक़ औरतों के इज्तिमाआत में शामिल होने की कोशिश करें। 





20. मजलिस में अल्लाह का जिक्र करते रहना : 





जब आप किसी मजलिस में अकेली या अपनी चंद बहनों के साथ बैठी हों तो अल्लाह का ज़िक्र करने से ग़फ़लत न करना और कोशिश यही करना कि ज़बान अल्लाह के ज़िक्र में मश्गूल रहे। ताकि जब मजलिस से फारिग हों तो आपके हिस्से में बैठने का भी सवाब लिखा जाये। 





अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया: 'जो शख्स किसी मजलिस में बैठे और अल्लाह का ज़िक्र न करे तो उसका बैठना अल्लाह की तरफ़ से उसके लिये बोझ बन जायेगा। यानी उसके लिये हसरत और नदामत होगी।'





(अबू दाऊद : 4856) 





जब आप मजलिस खत्म करने, मजलिस बर्खास्त करने का इरादा करें तो ये दुआ पढ़ना न भूलें, 'सुब्हानकल्लाहुम्म व बिहम्दि-क अश्हदु अल्ला इला-ह इल्लाअन्-त अस्तफ़िरु-कवअतूबु इलेक.’





(सहीहुत्तर्गीब व त्तहींब : 1516)





जब आप ये दुआ पड़ेंगी तो मजकूरा मजलिस में जो लग्वी, बेमाना, फ़िजूल बातें और ग़लतियाँ होंगी अल्लाह तआला सब लर्ज़िशों और ग़लतियों को माफ़ फ़र्मा देगा यानी ये दुआ आपकी मजलिस का कफ़्फ़ारा बन जायेगी। 





21. दूसरों की बातें करने से बचना : 





ऐ मेरी बहन अपनी मजलिस को गीबत, चुगली और फिजूल बातों से पाक रखने की आदत बनाओ क्योंकि ये इन्तिहाई बुरी और नापसंदीदा आदत है और डरती रहो कि कहीं उसके बुरे अंजाम और सज़ा को लपेट में न आ जाओ। 





अल्लाह रब्बुल इज्जत का फरमान है, 'तुम में से कोई किसी की ग़ीबत न करे क्या तुममें से कोई अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाना पसंद करता है? तुम्हें उससे कराहत आयेगी।'





(सूरह हुजुरात: 12) 





22. मजलिस में किसी को डांटना नहीं: 





किसी मजलिस में अगर किसी की जुबान से गैर-मुनासिब कलिमात निकल जायें या कोई गलती हो जाये तो आप उसकी इस्लाह ज़रूर करे लेकिन वहीं लोगों के सामने नहीं बल्कि मजलिस के इख़्तिताम (समाप्ति) पर अकेले में बड़ी नर्मी  के साथ उसे समझा देने में आपका फर्ज भी अदा हो जायेगा और उसकी इस्लाह भी हो जायेगी, इंशाअल्लाह! लोगों के सामने गलती बताने में या डाँटने से हो सकता है आपकी बहन अपने लिये बेइज्जती की बात समझे और दूसरी बार शायद वो आपकी मजलिस में न आये।










कुतुबख़ाना / लाईब्रेरी की अहमियत व जरुरत





23. घर में एक कुतुबख़ाना बना लें: 





ऐ मेरी बहन! कोशिश ये करें कि घर के एक कोने या घर में किसी मुनासिब जगह पर एक लाइब्रेरी बना ली जाए जिसमें चंद ऐसी मुफीद व अच्छी किताबें मौजूद हों जिससे आप और आपके घर वाले सब फायदा उठायें। 





24. अख़्लाक़ को बिगाड़ने वाले लिटरेचर पर पाबंदी लगा दें: 





ऐ मेरी बहन! आप अपना कीमती वक़्त बर्बाद करने से गुरेज करें। ऐसी गैर-मुनासिब बातों, बेकार रिसालों, मेग्ज़ीन्स और लिटरेचर जिसमें अख़्लाक़ को बिगाड़ने वाली बातें हों उनको पढ़ने और देखने में वक़्त बर्बाद न करें। बल्कि ऐसी चीजों पर घर में लाने की पूरी पाबंदी लगा दें। अगर ये चीजें आएगी तो उन्हें देखा भी जाएगा और उन्हें पढ़ा भी जायेगा। इसलिये वे न घर में आएंगी न उनको देखने व पढ़ने का मौका मिलेगा। 





25. सीरते सहाबियात का मुतालआ लाज़िम करें: 





बेहतर है कि आपके टेबल और आपकी लाइब्रेरी में मुख़्तलिफ़ मौजूद (विभिन्न विषयों) पर ऐसी किताबें हों जो हर औरत और हर बच्चा पढ़ सकें। आसानी से समझ में आने वाली किताबें हों जैसे तफ़्सीर इब्ने कसीर, सीरत इब्ने हिशाम, किताबुत्तौहीद, रियाजुम्सालिहीन वगैरह जिससे हर एक अपने अक़ीदे, अपने दीन, अपने प्यारे रसूल (ﷺ) की सीरते तय्यिबा, सहाब-ए-किराम के शब व रोज़ (रात व दिन), बच्चों की तबियत, वालिदैन के हुक़ूक़, घर वालों के हुकूक, रोज़मर्रा पेश आने वाले मसाइल के बारे में मालूमात हासिल करके अपने इल्म व अमल में इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) कर सकें। ये चीजें उसी वक़्त हासिल होंगी जब घर से ऐसी तालीम हासिल करने का शौक़ पैदा होगा। घर में बैठे वक़्त भी बर्बाद न होगा और इल्म का खज़ाना भी मिल जायेगा। 





26. किसी मुफ़ीद नये लिट्रेचर का इल्म हो जाना : 





जब आपको कोई मुफीद पेम्पलेट या इस्लाहे मुआशरे (समाज सुधार) की किताब का इल्म हो जाये तो फ़ौरन अपनी लाईब्रेरी में उसका इज़ाफ़ा करें और अपनी दूसरी बहनों को खरीदने और पढ़ने की तरग़ीब दिलाएं। इसी तरह अगर आपको किसी ऐसी किताब का इल्म हो जाये जो अख़्लाक़ को खराब करने वाली हो, तो उसके बारे में भी आप अपनी बहनों को ज़रूर इत्तिला (सूचना) दें ताकि वो ग़लती से भी ऐसी किताब न खरीदें जिससे सबका ईमान ख़राब हो। 





27. मुतालआ (अध्ययन) में मसरूफ़ रहना बेहद ज़रूरी है: 





ऐ मेरी बहन! आप कोशिश करें कि हर लम्हे को क़ीमती बनाया जाये और वक़्त को बर्बाद करने की बजाय इल्म व मुतालआ में गुज़ारा जाये।










घर से बाहर निकलने के आदाब





28. बगैर ज़रूरत घर से न निकलें: 





ऐ मेरी बहन! कोशिश तो यही करो बिला वजह घर से निकलना न हो। हाँ! अगर कोई ज़रूरी काम पड़ जाये और बाहर जाना ज़रूरी हो तो घर वालों के मश्वरे के बाद बहुत ही मुख्तसर वक़्त के लिये जिसमें काम मुकम्मल (पूरा) हो जाये, निकला जा सकता है। ज़रूरत से ज्यादा आपका घर से बाहर रहना मुनासिब नहीं। 





29. खुश्बू लगाकर न निकलें: 





ऐ मेरी बहन! अगर आपको घर से बाहर जाना पड़े तो ख़ुश्बू और जैबो-जीनत करने से पूरी तरह बचने की कोशिश करें ताकि लोगों की नजरें आपकी तरफ़ न उठे। हज़रत अबू मूसा (रजि.) बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया, 'जब कोई औरत ख़ुश्बू लगाकर लोगों के पास से गुज़रती है कि वो उसकी खुश्बूपायें तोवो औरत ऐसी है ऐसी है।' 





(अबूदाऊद:4173; निसाई : 5126)





यानी वो औरत बदकार है, ज़ानिया है। इजत दाग़दार होने से बचने के लिये बेहतर है कि आप अपना पूरा जिस्म ढाँप कर निकलें। आहिस्ता क़दमों से चलें ताकि चलने में आवाज़ न आये और न गुज़रने से खुश्बू आये। 





30. इधर-उधर बगैर जरूरत नहीं देखें: 





ऐ मेरी बहन! जब आप चल रही हों, गली, मुहल्ले, बाज़ार वगैरह में हों तो नज़रें घुमाकर देखने और इधर-उधर बगैर ज़रूरत झाँकने से बचें। नज़रों का इधर-उधर उलझ जाना खतरे से खाली नहीं। जब आप अपनी मतलूबा (चाही गई) चीज़ ख़रीदने लगे तो दुकानदार से ज़्यादा बातों में मश्गुल न हों। ज्यादा बातें करने से बीमार दिलों से फ़ितना भड़कने का इम्कान (सम्भावना) होती है। 





31. बुराई को अच्छा न समझें: 





ऐ मेरी बहन! जब आप घर से बाहर, बाज़ार में कोई नापसंदीदा चीज़ देखें तो उस पर आपकी तरफ़ से कराहत का इजहार होना लाज़िम है। अगर जुबान से नहीं तो कम से कम दिल से गुस्सा, नापसंदीदगी और बुराई का एहसास तो होना ही चाहिये। अल्लाह तआला फ़र्माता है, 'मोमिन मर्द व औरत आपस में एक दूसरे के (मुआविन व मददगार) दोस्त हैं वो भलाइयों का हुक्म देते और बुराइयों से रोकते हैं।' 





(सूरह तौबा: 71





32. बाहर घूमते रहने की आदत अच्छी नहीं: 





कुछ औरतों ने घर से बाहर निकलने को अपना शौक़ और आदत बना लिया है। वे घर से बाहर निकलती हैं और इतनी बेपरवाह हो जाती हैं कि घर की ख़बर नहीं होती। ऐसी औरतों से खैर व भलाई की उम्मीद नहीं रखी जा सकती। इसमें वक्त बर्बाद होने के अलावा फ़िले के इम्कान (सम्भावना) से इन्कार नहीं किया जा सकता। मैं तो अल्लाह से पनाह माँगता हूँ कि आपका नाम इस किस्म की औरतों में शामिल न हों क्योंकि ये आदत बहुत ही नापसंदीदा और बुरी है। 





33. जिस चीज़ की ज़रूरत हो वही ख़रीदना: 





ऐ मेरी बहन। जब आप अपने घर वालों के साथ या अपने खाविंद के साथ बाहर कोई चीज ख़रीदने के लिये निकलें तो जिस चीज़ की ज़रूरत हो वही खरीदें। ये न हो कि आप अपने घर को सुपर मार्केट की ब्रांच समझते हुए पूरी मार्केट ही लाकर घर भर दें। ये बहुत बुरी आदत है कि जब मार्केट में जो चीज़ हाथ लगे उसे खरीद लिया जाये चाहे उसकी ज़रूरत हो या न हो। ये फ़िजूलखर्ची की एक किस्म है जिसे अल्लाह रब्बुल इज्जत भी पसंद नहीं करता। 





अल्लाह हम सब को हिदायत फर्माये, आमीन!










दुआ के आदाब 





34. जो कुछ माँगना है अल्लाह से माँगोः 





ऐ मेरी बहन! आप कमज़ोर हैं, मुहताज हैं, फ़क़ीर हैं; हमेशा अल्लाह के सामने दुआ के लिये अपने हाथ उठाती रहा करें। उसी से माफ़ी की इल्तिजा करती रहा करें। सेहत व तंदुरुस्ती, खैर व आफ़ियत, दुनिया और आख़िरत की बेहतरी, यानी हर चीज़ उसी एक अल्लाह से तलब करती रहा करें। 





अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फर्माया : 'आपका रब हयादार है। वो (इस बात से) हया करता है जब बन्दा उसके सामने अपने हाथ उठाये तो वो उन्हें खाली वापस लौटा दे।' (इब्ने माजा : 3117)





या'नी जब उससे दुआ की जाती है तो वो खाली हाथ वापस नहीं लौटाता। लेकिन दुआ की कुबूलियत के लिये जल्दी नहीं करनी चाहिये क्योंकि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फर्माया, 'कोई भी बन्दा अल्लाह के सामने अपने हाथ ऐसे नहीं उठाता कि उसकी बग़लें ज़ाहिर हो रही हों और वो अल्लाह से कोई सवाल कर रहा हो, अल्लाह उसे जरूर अता कर देता है लेकिन (उसे) जो जल्दी न करे।' सहाब-ए-किराम (रजि.) ने पूछा, 'ऐ अल्लाह के रसूल! वो जल्दी कैसे करता है?' फ़रमाया, 'वो कहता है कि मैंने अल्लाह से माँगा है, अल्लाह से मांग रहा हूँ लेकिन कुछ नहीं मिला।'





(तिर्मिज़ी: 3969) 





अल्लाह तआला ही दुआ को कुबूल करता है लेकिन इसमें जल्दबाज़ी नहीं मचानी चाहिये। 





दुआ करने का तरीक़ा ये है कि अपनी दुआ अल्लाह की हम्द (तारीफ़) व बड़ाई के ज़िक्र के साथ और अल्लाह के रसूल (ﷺ) पर दरूद व सलाम पढ़कर शुरू करें। जब दुआ पूरी करें तो तब भी इसी तरह हम्द व सना और दरूद शरीफ़ पढ़ें। जब भी अल्लाह से कुछ चाहिये तो सच्चे दिल और पूरी तवज्जह से अल्लाह से माँगें।





अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़र्माया, 'अल्लाह तआला से दुआ इस तरह किया करो कि तुम उसके कुबूल होने का यक़ीन रखते हो और याद रखो कि अल्लाह तआला ग़ाफ़िल दिल वाले की दुआ कुबूल नहीं करता।'





(तिर्मिज़ी: 3479)





ऐ मेरी बहन! दुआ मांगते वक्त गुनाह और क़तम-रहमी (रिश्ता तोड़ने) की दुआसे हमेशा बचती रहना। अगर दुआकी कुबूलियत के आधार नज़र न आ रहे हों तो भी मायूस होने की कोई जरूरत नहीं अल्लाह सुब्हानहू व तआला उसी दुआ को आपके लिये आख़िरत में (अता करने के लिये) जखीरा कर देगा या फिर इसी दुनिया में आपके गुनाहों के कफ्फ़ारे या किसी आने वाली मुसीबत को टाल देने का सबब बना देगा। 





35. अल्लाह की कुर्बत हासिल करना : 





ऐ मेरी बहन! फ़राइज़, नवाफ़िल और ज़िक्रे इलाही और नेकी की दावत दे कर अल्लाह की कुर्बत (निकटता) हासिल करने की जद्दोजहद में लगी रहो । इंशाअल्लाह! ऐसा करने से आप अल्लाह के यहाँ अज्रे अज़ीम, सवाबे कसीर (बहुत ज्यादा सवाब) और आला दर्जात से नवाज़ी जाएंगी। अल्लाह करीम आपको अपनी ऐसे नेक बन्दियों की सफ़ (लाइन) में शामिल करेगा जिनको न इस दुनिया में किसी का ख़ौफ़ होगा और न आख़िरत में कोई परेशानी होगी। अल्लाह जिसकी चाहे उसकी दुआएं कुबूल करता है, उसकी परेशानियों और ग़मों को दूर करता है और उनके दिल इत्मीनान व सुकून और राहत से भर देता है।





प्यारे रसूल (ﷺ) ने इर्शाद फ़रमाया, 'अल्लाह ख़ालिके कायनात का फरमान है कि जिसने मेरे किसी वली से दुश्मनी की उसे मेरी तरफ़ से ऐलाने जंग है और मेरा बन्दा जिन-जिन इबादतों से मेरा क़ुर्ब हासिल करता है और कोई इबादत मुझको उससे ज़्यादा पसंद नहीं है जो मैंने उस पर फ़र्ज़ की है (यानी फ़राइज़ मुझको बहुत पसंद हैं जैसे नमाज़, रोज़ा, हज्ज, ज़कात) और मेरा बन्दा फ़र्ज़ अदा करने के बाद नफ़्ल इबादतें करके मुझसे इतना नजदीक हो जाता है कि मैं उससे मुहब्बत करने लग जाता हूँ। फिर जब मैं उससे मुहब्बत करने लग जाता हूँ तो मैं उसका कान बन जाता हूँ जिससे वो सुनता है, उसकी आँख बन जाता हूँ जिससे वो देखता है, उसका हाथ बन जाता हूँ जिससे वो पकड़ता है, उसका पाँव बन जाता हूँ जिससे वो चलता है और अगर वो मुझसे माँगता है तो मैं उसे देता हूँ, अगर वो किसी दुश्मन या शैतान से मेरी पनाह का तालिब होता है तो उसे महफूज़ रखता हूँ।'





(बुख़ारी : 6502) 





36. दीनदारों से ताल्लुक़ात बढ़ायें: 





ऐ मेरी बहन! जब आप ऐसी औरत को देखें जो दीन की पाबंद और रब का हुक्म मानने वाली है तो आपको उससे ताल्लुकात बढ़ाने चाहिये। उससे मुहब्बत का इज़हार करके उसे अपनी दोस्त बना लें क्योंकि अल्लाह के लिये मुहब्बत करने के बहुत फ़ायदे हैं और उसके अलावा अल्लाह का तकरूंब भी हासिल होता है।





अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फर्माया, 'अल्लाह तआला फ़र्माता है मेरी ताज़ीम के लिये जो आपस में मुहब्बत करते हैं उनके लिये नूर के मिम्बर होंगे अम्बिया और शुहदा उन पर रश्क करेंगे।'





(तिर्मिज़ी : 2390) 





37. अपने वक़्त की क़द्र करें: 





ऐ मेरी बहन! अगर आप अपने वक़्त की सहीह तरीके से तक़सीम न करेंगी तो वक़्त हाथ से निकल जायेगा। आप तालिबा (छात्रा, स्टुडेण्ट) हैं या घरेलू औरत, कुछ भी हो, आपको अपने कीमती वक्त का एहतिताम करना ही होगा।





कुरआन पढ़ना है, हदीस की मालूमात लेनी हैं, अपने स्कूल या मदरसा के दुरूस (चेप्टर्स) याद करने हैं, घर के काम-काज, अज़ीज़ व अकारिब, वालिदैन, खाविंद की ख़िदमत और रात व दिन के अज़्कार के लिये भी वक़्त निकालना है। अगर वक़्त को सहीह इस्तेमाल न किया तो फिर वक़्त के बर्बाद होने में तो कोई शक नहीं लेकिन इससे आपको हसरत व नदामत (शर्मिन्दगी) के सिवाय कुछ हासिल न होगा। 





38. रिज़्क़ और उम्र में बरकत का सबब (कारण): 





अपने रिश्तेदारों के यहाँ आने-जाने में बरकत है। उनकी ज़ियारत करना उम्र में ज़्यादती का और रिजक में बरकत का सबब होता है। आपको चाहिये कि अपने अकरबा (प्रियजनों) और रिश्तेदारों की जियारत को फ़ायदेमंद बनायें, उन्हें भलाई की बातों की तल्कीन करें, नापसंदीदा और अख़्लाक़े रजीला (घटिया चरित्र) वाली बातों से ख़ुद भी गुरेज़ करें और अकरबा को भी बचने की तल्कीन करें। हाल व अहवाल पूछने की मजलिस में ही उन्हें इन फ़ितने में डालने वाली चीज़ों के अंजाम से डरा दें। आपका अपने अज़ीज़ व अक़ारिब की ज़ियारत करना खैर व बरकात के नुजूल व हुसूल का सबब बन जाता है।





अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया, 'जिसे पसंद है कि उसका रिज़्क़ बढ़े और उसकी उम्र लम्बी हो, वो सिलारहमी किया करे।' 





(बुख़ारी : 5985) 





39. गुनाह पर फक्र न करें: 





ऐ मेरी बहन! आपको अल्लाह के अहकाम को ज़्यादगी, उनकी मुखालिफ़त (विरोध) करने और उनमें सुस्ती करने का आदी और मग़रूर न बना दे। कोई वक़्त आयेगा कि अपनी जान पर जुल्म करने वाला इन्सान गुस्से से अपने हाथ काट कर खायेगा और मोमिन अपनी नजात पर खुशी के इज़हार से अपना हाथ लहरा रहा होगा। कुरआन करीम में अल्लाह सुब्हानहू व तआला फ़र्माता है, 





'जिसे उसका नामा-ए-आमाल उसके दायें हाथ में दिया जायेगा तो वो कहेगा कि ये लो मेरा नामा-ए-आ'माल पढ़ो! मुझे तो पक्का यक़ीन था कि मुझे अपना हिसाब मिलना है। लेकिन जिसने अपने आप पर जुल्म किया होगा, वो उस वक्त की सख़्ती और हौलनाकियों को देखकर कुछ न कर सकेगा, सिवाय इसके कि वो कहेगा कि काश! मैं अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) की बात को मान लेता और मुझे ऐसा अंजाम देखना नसीब न होता।' 





(सूरह हाक्कह:19-20





40. अपने दिल में रहम और नर्मी पैदा करें: 





हज़रत अबू हुरैराह (रजि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया, 'एक शख्स रास्ते में चल रहा था कि उसे बहुत तेज़ प्यास लगी उसे एक कुंआ मिला और उसने उसमें उतर कर पानी पिया। जब बाहर निकला तो उसने वहाँ एक कुत्ता देखा जो हाँप रहा था और प्यास की वजह से तरी को चाट रहा था उस शख्स ने कहा कि ये कुत्ता भी उतना ही ज़्यादा प्यासा मालूम हो रहा है जितना मैं था। चुनाँचे वो फिर कुएं में उतरा और अपने जूते में पानी भरा और मुंह से पकड़कर ऊपर लाया और कुत्ते को पानी पिला दिया। अल्लाह तआला ने उसके इस अमल को पसंद फ़रमाया और उसकी मगफिरत कर दी।' सहाबा-ए-किराम (रजि.) ने अर्ज़ किया, 'या रसूलुल्लाह (ﷺ)! क्या हमें जानवरों के साथ नेकी करने में भी सवाब मिलता है। आप (ﷺ) ने फ़रमाया, 'तुम्हें हर ताज़ा कलेजे वाले पर नेकी करने में सवाब मिलता है।'





(बुख़ारी : 6009)





हुज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि.) बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फर्माया, 'एक औरत को एक बिल्ली की वजह से अज़ाब हुआ, जिसे उसने इतनी देर बाँधे रखा कि वो भूख की वजह से मर गईं। और औरत इसी वजह से जहन्नम में दाखिल हुई।’ 





(सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)





ऐ मेरी बहन हर एक छोटे और बड़े पर रहम किया करो, यहाँ तक कि जानवरों के साथ भी। जैसा कि प्यारे रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया, 'जो रहम नहीं करता उस पर रहम नहीं किया जाता।'





41. गैर इस्लामी ऐलानात से मुतासिर (प्रभावित) न हों: 





ऐ मेरी बहन! हर रोज़ नये से नये ऐलानात और इश्तिहारात जो हर तरफ़ से औरतों को नई तहज़ीब और रोशन ख़याली (आधुनिकता) का नाम देकर फ़ितने में डालने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे हर्गिज़ मुतासीर न होना। एक मुस्लिम व शरीफ़ औरत को उसकी पाकीज़गी, पर्दा और हया की हदों से निकलने के लिये मुख़्तलिफ़ वसाइल (विभिन्न सांधन) इस्तेमाल किये जा रहे हैं जिनसे खुद बचना और दूसरी बहनों को बचाना आपका काम है। ऐसा न हो कि कहीं गैरों की तो क्या अपनों की ही बातों में आकर आप रोशन ख़याली के जाल में फंस जायें, वर्ना इज्जत महफूज़ (सुरक्षित) रहने का भी यकीन नहीं और गुनाह से बचने की भी उम्मीद नहीं। 





42. अपने दीन को मज़बूती से थामे रहो: 





अल्लाह रब्बुल इज्जत का फर्मान है, 'तुम ही ग़ालिब रहोगे, अगर तुम ईमानवाले हो।' (सूरह आले इमरान : 139) 





अगर आप अपने दीन पर मज़बूती से अमल करती रहेंगी, सुस्ती और कमज़ोरी न दिखायेंगी तो अल्लाह रब्बुल इज्जत भी आपको कामयाबी से हम किनार करेगा। आप दीने इस्लाम के अहकाम को फैलाने में शर्म न करें, जहाँ उसकी तौहीन या उसका मज़ाक उड़ाया जा रहा हो वहाँ भी उसके दिफ़ाअ (सुरक्षा करने) में पीछे न हटें और अपने अक़ीदे को थामे हुए अपने दीन पर डटी रहें। 





43. इस्लामी पहचान को अपनी गिजा बना लें: 





दीनी कैसेट, इस्लामी तकरीरें इज्तिमाई दीनी दर्स और मुफीद इस्लामी महफ़िलों को आप अपनी ग़िज़ा (खुराक़) बना लें और मुफीद दीनी रिसाले और अख़बारात का मुतालआ करती रहा करें जिनसे आपके इल्म में इज़ाफ़ा होता हो। 





44. अच्छे अख़्लाक़ को अपनी आदत बना लें: 





ऐ मेरी बहन! घर में, स्कूल व कॉलेज में, हर महफ़िल में, अज़ीज़ व अक़ारिब, दोस्तों और पड़ोसियों में नफ़ा देने वाले इल्म, भलाई, अख़्लाक़े हसना (उत्तम चरित्र) और आदते जमीला (अच्छे स्वभाव) को आम करने की कोशिश करें। 





45. घर के काम-काज में शर्म महसूस न करें: 





ऐ मेरी प्यारी बहन! आप हमेशा ये कोशिश करें कि घर के काम-काज में अपने घर वालों का हाथ बटायें। इसमें खैर भी है और उनकी खिदमत भी, जिसके बदले में आपको नेक दुआएँ मिलेंगी और उसमें एक ऐसी ट्रेनिंग भी है जो इंशाअल्लाह आपकी आने वाली जिंदगी को कामयाब बना देगी। फ़ारिग (फ़ालतू) बैठने, सुस्ती करने या स्कूल-मदरसे के होमवर्क के नाम से हर वक्त घर के काम-काज से जी चुराना और दामन बचाना कोई अच्छी आदत नहीं है। ये बुरी आदत आपको कामचोर, आलसी और सुस्त बना देगी। इस बुरी आदत की वजह से घर में आपकी कद्र कम होगी और माँ-बाप के प्यार व उनकी दुआओं से महरूम होना पड़ेगा।





46. हमेशा हसमुख और मुस्कुराते रहें: 





अल्लाह के रसूल (ﷺ) का फर्मान है, अपने भाई के सामने मुस्कुराना भी आपके लिये सदक़ा है। (तिर्मिज़ी) 





ऐ मेरी बहन! हंसमुख रहने और मुस्कुराते चेहरे में न आपका कुछ बिगड़ेगा और न ही कुछ खर्च करना पड़ेगा बल्कि इसी वक़्त में आप अपनी बहनों और मजलिस में बैठी सहेलियों को अपनी तरफ़ मुतवजह भी कर सकेंगी और बात भी बाअसर (प्रभावशाली) भी रहेगी, इसमें इज्जत भी है और अज्रे सवाब भी। 





47. न गुस्सा करें, न गुस्सा दिलाएं: 





हज़रत अबू हुरैरह (रजि.) बयान करते हैं कि एक आदमी अल्लाह के रसूल (ﷺ) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कहा कि मुझे नसीहत कीजिये। आप (ﷺ) ने फर्माया, 'गुस्सा नहीं किया कर!' इस सवाल को उस आदमी ने कई दफ़ा दोहराया तो फिर भी आप (ﷺ) ने यही नसीहत फ़रमाई, 'गुस्सा नहीं किया कर!' (बुख़ारी : 6116)





ऐ मेरी प्यारी बहन! आपको ये मालूम होना चाहिये कि ये गुस्सा शैतान की तरफ़ से होता है। अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया, 'गुस्सा शैतान की तरफ़ से है और शैतान आग से पैदा किया गया है और आग पानी से बुझाई जाती है, लिहाज़ा जब किसी को गुस्सा आये तो वुजू कर लिया करे।' (अहमद)





तो ऐ मेरी बहन! दूसरों की ग़लतियों और गुस्ताखियों को माफ़ करने की आदत बना ले तो आपका किरदार बुर्दबारी (संजीदगी) से भरपूर हो जाएगा। 





48. कुफ़्फ़ार की आदात न अपनायें: 





रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया, 'जो किसी की मुशाबिहत (समरूपता) करता है वो उन्हीं में से होता है।'





(अबू दाऊद : 4031) 





ऐ मेरी बहन! कुफ्फार की तक़लीद करने से हर वक़्त बचना चाहिये। उनकी आदतों खुसुसन खाने-पीने लिबास वगैरह के तरीके अपनाने से बचना। 





49. नमाज़ में ताख़ीर (देरी) न करें: 





बहुत सी औरतें ऐसी हैं जो नमाज़ के बारे में सुस्ती करती हुए इसे लेट कर देती हैं। घर के काम-काज या फिजूल बातों में मश्गुलियत की वजह से, खसूसन शादियों, वलीमों की महफ़िलों में बहुत ही ग़फ़लत कर देती है। नऊजुबिल्लाह मिन ज़ालिक! मैं अल्लाह से पनाह माँगता हूँ कि आप उन जैसी हो जायें। 





कुरआन  करीम में अल्लाह सुब्हानहू व ताला इर्शाद फ़र्माता है, 'तबाही है उन नमाज़ियों के लिये जो अपनी नमाज़ों में सुस्ती कर जाते हैं।'





(सूरह अबस: 4-5





या'नी नमाज़ों में ताखीर (देरी) कर जाते हैं यहाँ तक कि नमाज़ का वक्त भी निकल जाता है। इसलिये ऐ मेरी प्यारी बहन नमाज़ जैसी अहमतरीन इबादत में सुस्ती बरतने की अगर आपको आदत हो तो इसे फ़ौरन छोड़ दो। 





50. नफ़्स का तजकिया होना लाज़मी है: 





नफ़्स के तजकिया (व्यक्तित्व के शुद्धिकरण) के लिये सबसे बेहतरीन ज़रिआ रोज़ा है जिसकी अहमियत भी बहुत है और उसका अज्र  भी बहुत ज्यादा है। इंसान के नफ़्स के तजकिये और इस्लाह के लिये इसका बहुत बड़ा किरदार है।





ऐ मेरी प्यारी बहन! ये आपके लिये बहुत ही बेहतरीन होगा कि आप नफ्ली रोज़ों को जैसे शव्वाल के छह और अय्यामे-बीज के रोज़ों (हर महीने की 13, 14 व 15 तारीख) के तीन रोजों को अपनी आदत में शामिल कर लें। 





प्यारी बहना! ये तमाम नसीहते, एक मुस्लिम होने के नाते आपकी खैरख्वाही की नीयत से शाए (प्रकाशित) की गई हैं। आपसे गुज़ारिश की जाती है कि एक मुस्लिमा होने के नाते आप इन पर संजीदगी से गौर करें और अपनी दीगर मुस्लिम बहनों तक इस लेख को पहुँचाएं और उन्हें पढ़ने की सलाह दें। इसके साथ ही आप अपनी गैर-मुस्लिम सहेलियों को भी इस्लाम की इन अच्छी-अच्छी बातों की जानकारी दें। ऐसा करना आख़िरत में आपके लिये बहुत फायदेमंद होगा, इंशाअल्लाह।





अल्लाह सुब्हानहू व तआला से दुआ है कि वो तमाम मुसलमानों को इन नसीहतों पर अमल करने की तौफ़ीक़ इनायत फरमाए और शैतान के शर्र (बुराइयों) से बचाकर हम सबके लिये शरीयते-मुहम्मद (ﷺ) पर चलना आसान कर दे, आमीन! तक़ब्बल या रब्बल आलमीन।





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बेहोशी से शिफ़ा पाना | हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा



हज़रत जाबिर (र.अ) फ़र्माते हैं के -





"एक मर्तबा मैं सख्त बीमार हुआ, तो रसूलुल्लाह (ﷺ) और हजरत अबू बक्र सिद्दीक (र.अ) दोनों हज़रात मेरी इयादत को तशरीफ़ लाए, यहां पहुँच कर देखा के मैं बेहोश हूँ तो आप (ﷺ) ने पानी मंगवाया और उससे वुजू किया और फिर बाकी पानी मुझपर छिड़का, जिससे मुझे इफ़ाका हुआ और मैं अच्छा हो गया।"





📕 मुस्लिम: ४१४७, जाबिर बिन अब्दुल्लाह (र.अ)



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हर नमाज के बाद तस्बीह फातिमी अदा करना



रसूलल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :





“जो हर फ़र्ज नमाज़ के बाद ३३ मर्तबा “सुभानअल्लाह” ३३ मर्तबा “अलहम्दुलिल्लाह” और ३४ मर्तबा “अल्लाहु अकबर” कहता है, वह कभी नुकसान में नहीं रहता।”





📕 मुस्लिम : १३४९



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वालिदैन की नाफरमानी और जुल्म करने का गुनाह



रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :





"तुम जुल्म व सितम करने से बचो ! क्योंकि जुल्म व सितम की सज़ा दूसरी सजाओं के मुकाबले में सबसे जल्दी मिलती है। और वालिदैन की नाफर्मानी से बचो! अल्लाह की कसम वालिदैन का नाफ़र्मान जन्नत की खुश्बू भी नहीं पाएगा। जब के जन्नत की खुश्बू एक हजार साल की दूरी से महसूस होती है।"





📕 तबरानी औसत: ५८२५



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च्यूँटी अल्लाह की कुदरत का नमूना है



च्यूटी भी अल्लाह की अजीब मखलूक है। इतने छोटे से जान्वर में अल्लाह तआला ने आँख नाक कान दिल व दिमाग हाथ पैर कितनी कारीगरी से बनाए। फिर इन को सोचने, समझने और सूंघने की बेपनाह सलाहियतों से नवाज़ा।





वह एक मील की दूरी से मीठी चीज़ों का सूंघ कर पता लगा लेती है। च्यंटियों की सरदार को जब कोई चीज़ मिलती है, तो वह अपने मातहत तमाम च्यंटियो को बुलाती है।।और वह उस चीज़ को उठा कर अपने बिलों में ले जाती हैं।





अगर किसी दाने के जमने का खतरा महसूस करती हैं, तो उस के टुकड़े कर देती हैं और गर्मी के मौसम में सर्दी के लिए और इसी तरह बरसात का मौसम आने से पहले ही ज़खीरा जमा कर लेती हैं, बगैर किसी मशीन व आला के गर्मी और बरसात के मौसम की खबर उन्हें किस ने दी? इतनी छोटी सी मखलूक को ऐसे ऐसे हनर सिखा देना अल्लाह की कुदरत का करिश्मा है।





📕 अल्लाह की कुदरत



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घर में नफील नमाज़ पढ़ने की फ़ज़ीलत



रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया : 





"जब तुम में से कोई मस्जिद में (फ़र्ज़) नमाज़ अदा कर ले, तो अपनी नमाज़ में से कुछ हिस्सा घर के लिए भी छोड़ दे; क्योंकि अल्लाह तआला बन्दे की (नफ़्ल) नमाज़ की वजह से उस के घर में खैर नाज़िल करता हैं।"





📕 सही मुस्लिम : ७७८, अन जाबिर (र.अ)










एक और रिवायत में, रसूलअल्लाह(ﷺ) ने फरमाया –





“फ़र्ज़ नमाज़ के अलावा (सुन्नत और नवाफ़िल नमाज़े) घर में पढ़ना मेरी इस मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) में नमाज़ पढ़ने से भी अफ़ज़ल है।”





📕 सुनन अबू दाऊद: 1044, जैद इब्ने थाबित (र.अ.)





नोट : ख्याल रहे के फ़र्ज़ नमाज़े मस्जिद में ही पढ़ना अफ़ज़ल और इन्तेहाई जरुरी है।



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हज़रत खदीजा (र.अ) की फजीलत व खिदमात



उम्मुल मोमिनीन हज़रत खदीजा (र.अ) को जो फज़ल व कमाल अल्लाह तआला ने अता फ़रमाया था, उस में कयामत तक कोई खातून शरीक नहीं हो सकती, उन्होंने सब से पहले हुजूर (ﷺ) की नुबुव्वत की तसदीक करते हुए ईमान कबूल किया।





सख्त आज़माइश में आप (ﷺ) का साथ देना, इस्लाम के लिए हर एक तकलीफ़ को बर्दाश्त करना, रंज व गम के मौके पर आप (ﷺ) को तसल्ली देना, यह उन की वह सिफ़ात हैं, जो उन्हें दीगर उम्महातुल मोमिनीन से मुमताज कर देती हैं।





अल्लाह तआला ने (फ़रिश्ते) जिब्रईले अमीन के जरिए उन्हें सलाम भेजा। खुद पैगंबर (ﷺ) ने फ़रमाया “अल्लाह की कसम! मुझे खदीजा से अच्छी बीवी नहीं मिली”, वह उस वक्त मुझ पर ईमान लाई जब लोगों ने इन्कार किया। उस ने उस वक्त मेरी नुबुव्वत की तसदीक की जब लोगों ने मुझे झुटलाया, उसने मुझे अपना माल व दौलत अता किया जब के दूसरे लोगों ने महरूम रखा। हकीकत यह है के इब्तिदाए इस्लाम में उन्होंने दीन की इशाअत व तबलीग में अपनी जानी व माली खिदमात अंजाम देकर पूरी उम्मत पर बड़ा एहसान किया है।





अल्लाह तआला उन्हें इस का बेहतरीन बदला अता फरमाए। (आमीन), सन १० नब्वी में ६५ साल की उम्र में (वफ़ात पाई और मक्का के हुजून नामी कब्रस्तान (यानी जन्नतुल माला) में दफन की गई।





📕 इस्लामी तारीख



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शबे मेराज का वाकिया | Shab e Meraj ka waqia

शबे मेराज का वाकिया | Shab e Meraj ka waqia in Hindi

मेराज की घटना नबी (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) का एक महान चमत्कार है, और इस में आप (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) को अल्लाह ने विभिन्न निशानियों का जो अनुभव कराया यह भी अति महत्वपूर्ण है।

मेराज के दो भाग हैं, प्रथम भाग को इसरा और दूसरे को मेराज कहा जाता है, लेकिन सार्वजनिक प्रयोग में दोनों ही को मेराज के नाम से याद कर लिया जाता है।

इसरा क्या है ?

इसरा कहते हैं रात के एक भाग में चलना, अभिप्राय यह है कि मुहम्मद (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) का रात के एक भाग में मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक़सा (बैतुल मक़्दिस) तक की यात्रा, जिसका वर्णन अल्लाह ने सुरः बनी इस्राइल (इस्रा) के शुरू में किया हैः

“क्या ही महिमावान है वह जो रातों-रात अपने बन्दे (मुहम्मद) को प्रतिष्ठित मस्जिद (काबा) से दूरवर्ती मस्जिद (अक़्सा) तक ले गया, जिसके चतुर्दिक को हमने बरकत दी, ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियाँ दिखाएँ। निस्संदेह वही सब कुछ सुनता, देखता है” – (अल-कुरान सूरःइस्रा 1)

मस्जिदे हराम मक्का में है और मस्जिदे अक़सा फलस्तिन में है, दोनों के बीच की दूरी चालीस दिन की थी, चालीस दिन की यह दूरी अल्लाह के आदेश से रात के एक थोड़े से भाग में तै हो गई। जिसमें अल्लाह की महानता की पहचान है कि उसका कोई भी काम माध्यम का पाबंद नहीं होता।

मेराज क्या है ?

मेराज का अर्थ होता है चढ़ने का माध्यम अर्थात् सीढ़ी, मस्जिदे अक़सा से नबी (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) को आसमानों पर ले जाया गया, कुछ रिवायतों में सीढ़ी का शब्द प्रयोग हुआ है कि इसी के द्वारा आपको आसमानों पर ले जाया गया था। इसी लिए आसमानी यात्रा के इस दूसरे भाग को मेराज कहा जाता है। इसका कुछ वर्णन अल्लाह ने सूरः नज्म में किया है और अन्य बातें हदीसों में विस्तृत रूप में बयान हुई हैं।

इसरा और मेराज की यह घटना वास्तव में एक महत्वपूर्ण चमत्कार है, वीदित है कि चालीस दिन की यात्रा रात के एक थोड़े भाग में कर लेना किसी इंसान के वश की बात नहीं, उसी प्रकार रात के उसी भाग में आसमानों की सैर कर लेना भी प्रत्यक्ष रूप में एक अनहोनी सी घटना है, परन्तु जब उसकी निस्बत अल्लाह की ओर हो अर्थात् उसमें अल्लाह की शक्ति पाई जाए तो फिर उसे असम्भव समझना किसी मुसलमान के योग्य नहीं इसी लिए इस प्रकार की घटनाओं को मोजज़ा अर्थात् चमत्कार कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है विवश कर देने वाली घटनाएं।

अब हम इसरा और मेराज की घटनाओं का संक्षिप्त में वर्णन कर रहे हैं :

• सीना चीरा जानाः

अल्लाह के रसूल (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: मैं अपने घर में सोया हुआ था कि मेरे पास एक सज्जन (हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम) आए और वह मुझे काबा के पास हतीम में ले आए फिर मेरा सीना चीरा, मेरा दिल निकाला और एक सोने का तश्त लाया गया जो ईमान औऱ हिकमत से भरा हुआ था, उससे मेरा दिल धोया और पहले की तरह रखा। – (बुखारी, मुस्लिम)

सीना चीरे जाने की घटना सही रिवायतों में मौजूद है, इस लिए इसमें किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश नहीं। और यह पहली बार नहीं था अपितु इससे पहले भी दो बार हो चुका था, पहली बार बाल्यावस्था में जब आप हलीमा सादिय के घर में परवरिश पा रहे थे, और दूसरी बार नबी बनाए जाने के समय। जैसा कि हाफिज़ इब्ने हज्र ने बयान किया है। और शायद इस में हिकमत यह थी कि आपको बाद में पेश आने वाली बड़ी बड़ी घटनाओं के लिए तैयार किया जाए। – (ज़ादुल खतीब, डा. हाफिज़ मुहम्मद इस्हाक़ ज़ाहिद 1/ 289)

• इसरा की शुरूआतः

फिर उसके बाद एक जानवर लाया गया जो घोड़े से छोटा और गधा से थोड़ा बड़ा था और सफेद था, उसे बुराक़ कहा जाता था, उसका हर कदम आंख की अन्तिम छोड़ पर पड़ता था. हज़रत अनस रज़ि. कहते हैं कि बुराक़ को जब लाया गया जिस पर ज़ैन कसी हुई थी जब उस को नकील डाली गई तो उसने कुछ तंगी बरती, उससे कहा गया क्या तुम मुहम्मद (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) के तंगी करती हो जब कि अल्लाह के पास उन से अधिक सम्मानित कोई नहीं, उसने जब यह बात सुनी तो उसके पसीने झूट गाए। – (तिर्मिज़ीः अलबानी ने इसे सही कहा है)

• बैतुल मक़दिस में:

नबी सल्ल. फरमाते हैं” मैं उस बुराक़ पर सवार हुआ यहां तक कि बैतुल मक़दिस में पहुंच गया, अतः मैं नीचे उतरा और अपनी सवारी को उसी स्थान पर बांधा जहां अन्य संदेष्टा बांधा करते थे, फिर मैं मस्जिद के अंदर चला गया और उस में दो रकअत नमाज़ अदा की। और दूसरी रिवायत में यह है कि मैंने सारे संदेष्टाओं को जमाअत से नमाज़ पढ़ाई।

मेराजः

नबी (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) फरमाते हैं फिर जीब्रील ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे आसमाने दुनिया की ओर ले गए। इब्ने हज्र ने कुछ रिवायतें यह भी बयान की हैं कि आपके लिए एक सुंदर सीढ़ी गाड़ी गई जिसके द्वारा आप ऊपर गए।

• पहले आसमान पर:

जिब्रील मुझे लेकर आसमाने दुनिया पर पहुंचे तो दरवाजा खुलवाया, पूछा गया कौन साहब हैं? उन्होंने कहा कि जीब्रील (अलैहिस्सलाम), पूछा गया और आपके साथ कौन हैं? आपने कहा कि मुहम्मद (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) ! पूछा गया कि क्या उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया था? उन्होंने कहा कि हाँ! इस पर आवाज आई उनका स्वागत है मुबारक आने वाले हैं। और दरवाजा खोल दिया। जब मैं(सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) अंदर गया तो वहां आदम (अल्लैहिस्सलाम) को देखा, जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया: यह आपके दादा आदम हैं, उन्हें सलाम करें, मैंने उन्हें सलाम किया और उन्होंने जवाब दिया और कहा आपका स्वागत है, नेक बेटे और अच्छे नबी।

• दूसरे आसमान पर:

जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ऊपर चढ़े और दूसरे आकाश पर आए, वहाँ भी दरवाजा खुलवाया आवाज़ आई कौन साहब आए हैं? बताया कि जीब्रील (अलैहिस्सलाम) पूछा गया तुम्हारे साथ और कोई साहब हैं? कहा मोहम्मद (रसूलुल्लाह) पूछा गयाः क्या आप उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया था? उन्होंने कहा कि हां, फिर आवाज आयी उनका स्वागत है। क्या हैं अच्छे आने वाले वे। फिर दरवाजा खुला और अंदर गए तो वहां यह्या और ईसा (अलैहिमुस्सलाम) मौजूद थे। यह दोनों पैतृक ज़ाद भाई हैं। जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया यह ईसा और यह्या अलैहिमुस्सलाम हैं, उन्हें सलाम कीजिएः मैं सलाम किया और उन लोगों ने मेरे सलाम का जवाब दिया और कहा आपका स्वागत है, प्यारे नबी और अच्छे भाई.

• तीसरे आसमान पर:

फिर जीब्रील (अलैहिस्सलाम) मुझे तीसरे आसमान पर ले कर चढ़े और दरवाजा खुलवाया. पूछा गयाः कौन साहब आए हैं? कहा कि जीब्रील पूछा गयाः और अपने साथ कौन साहब आए हैं? कहा कि मुहम्मद (पैगंबर), पूछा गया क्या उन्हें लाने के लिए भेजा गया था? कहा कि हाँ ! इस पर आवाज़ आईः उन्हें आपका स्वागत है। क्या ही अच्छे आने वाले हैं, दरवाजा खुला और जब मैं अंदर गया तो वहां यूसुफ (अलैहिस्सलाम) मौजूद थे। जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया कि यह यूसुफ हैं, उन्हें सलाम कीजिए, मैंने सलाम किया तो उन्होंने जवाब दिया और कहा आपका स्वागत है, नेक नबी और अच्छे भाई।

• चौथे आसमान पर:

फिर हज़रत जीब्रील (अलैहिस्सलाम) मुझे लेकर ऊपर चढ़े और चौथे आसमान पर पहुंचे, दरवाजा खुलवाया तो पूछा गयाः कौन साहब हैं? बताया कि जीब्रील! पूछा गयाः और अपने साथ कौन है? कहा कि मुहम्मद (पैगंबर), पूछा गया कि क्या उन्हें बुलाने के लिए आपको भेजा गया था? कहाः हां कहा, जवाब मिलाः उनका स्वागत है, क्या ही अच्छे आने वाले हैं वह। अब दरवाजा खुला, वहाँ इदरिस (अलैहिस्सलाम) की सेवा में पहुंचे, जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया यह इदरिस (अलैहिस्सलाम) हैं उन्हें सलाम कीजिए, मैं ने उन्हें सलाम किया और उन्होंने जवाब दिया और कहा आपका स्वागत है, नेक भाई और नेक नबी.

• पांचवें आसमान पर:

फिर मुझे लेकर पांचवें आसमान पर आए और दरवाजा खुलवाया, पूछा गया कौन साहब हैं? कहा कि जीब्रील, पूछा गयाः तुम्हारे साथ कौन साहब आए हैं? कहा कि मुहम्मद (रसूलुल्लाह) पूछा गया कि उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया था? कहा कि हाँ, तब आवाज आईः स्वागत है उनका, अच्छे आने वाले हैं वे, यहाँ हारून (अलैहिस्सलाम) की सेवा में हाज़िर हुए तो जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने बताया कि यह हारून हैं उन्हें सलाम कीजिए, मैं उन्हें सलाम किया उन्होंने उत्तर दिया और कहाः स्वागत नेक नबी और अच्छे भाई।

• छठे आसमान पर:

यहाँ से आगे बढ़े और छठे आसमान पर पहुंचे और दरवाजा खुलवाया, पूछा गयाः कौन साहब आए हैं? बताया कि जीब्रील, पूछा गयाः आप के साथ कोई अन्य साहब आए हैं? कहा कि मुहम्मद (पैगंबर) पूछा गयाः क्या उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया था? कहा कि हाँ. तब कहाः उनका स्वागत है, अच्छे आने वाले हैं वे। जब वहाँ मूसा (अलैहिस्सलाम) की सेवा में हाज़िर हुए तो जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया कि यह मूसा हैं, उन्हें सलाम कीजिए, मैं सलाम किया और उन्होंने सलाम का जवाब देने के बाद कहा स्वागत है नेक नबी और अच्छे भाई. जब आगे बढ़ा तो वह रोने लगे उन से पूछा गया कि आप क्यों रो रहे हैं? तो उन्होंने कहाः मैं इस पर रो रहा हूँ कि यह लड़का मेरे बाद नबी बना कर भेजा गया लेकिन जन्नत में उसके अनुयाई मेरी उम्मत से अधिक होंगे.

• सातवें आसमान पर:

फिर जीब्रील (अलैहिस्सलाम) मुझे लेकर सातवें आसमान की ओर गए और दरवाजा खुलवाया. पूछा गया कौन साहब आए हैं? कहा कि जीब्रील. पूछा गयाः और अपने साथ कौन साहब आए हैं? जवाब दिया कि मुहम्मद (पैगंबर) पूछा गयाः क्या उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया था? कहा कि हाँ. तब कहा कि उनका और आपका स्वागत है, क्या ही अच्छे आने वाले हैं वे, जब अंदर गए तो वहाँ इब्राहीम (अलैहिस्ससलाम) उपस्थित थे.

जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने कहा कि यह आपके जद्दे अमजद हैं, उन्हें सलाम करें. मैंने उन्हें सलाम किया तो उन्होंने जवाब दिया और कहा आपका स्वागत है, नेक नबी और नेक बेटे। फिर सिदरतुल मुन्तहा मेरे सामने कर दिया गया मैंने देखा कि इसके फल हिज्र (स्थान) के मटकों की तरह (बड़े) थे और उसके पत्ते हाथियों के कान की तरह थे। जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने कहा कि यह सिदरतुल मुन्तहा है, वहाँ चार नदियां देखीं, दो नीचे की ओर और दो ऊपर की ओर, मैंने पूछाः जीब्रील ये क्या हैं? उन्होंने बताया कि दो अंदर वाली नदियां जन्नत में हैं, और दो बाहर वाली नदियां नील और फरात हैं।

शबे मेराज का असल तोहफा :

फिर मेरे सामने बैतुल मामूर को लाया गया, वहाँ मेरे सामने तीन बर्तन प्रस्तुत किए गए एक में शराब दूसरे में दूध और तीसरे में शहद था. मैंने दूध का बर्तन ले लिया तो जीब्रील (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमायाः यही प्रकृति है, और आप तथा आपकी उम्मत इसी पर कायम हैं, फिर मुझ पर दिन और रात में पचास नमाज़ें अनिवार्य की गईं, वापस हुआ और मूसा के पास से गुज़रा तो उन्होंने पूछाः किस चीज़ का आपको आदेश हुआ?

मैंने कहाः कि दैनिक पचास समय की नमाज़ो का।

मूसा (अलैहिस्सलाम) ने कहाः लेकिन आपकी उम्मत में इतनी ताकत नहीं है। वल्लाह मैं इससे पहले लोगों को आज़मा चुका हूँ, और इस्राएल के साथ मेरा सख्त अनुभव है। इसलिए अपने रब के सामने जाइए और उनमें कटौती के लिए निवेदन कीजिए। अतः मैं अल्लाह के दरबार में गया, और कमी के लिए पूछा तो दस समय की नमाज़ें कम कर दी गईं। फिर जब वापसी में मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास से गुज़रा तो उन्होंने फिर वही सवाल किया फिर उन्हों ने कहा कि आप अल्लाह की सेवा में दोबारा जाइए, उस बार भी दस समय की नमाज़ें कम कर दी।

फिर मैं मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास से गुज़रा तो उन्होंने वही मांग तीसरी बार भी दोहराई, अतः इस बार भी अल्लाह के दरबार में उपस्थित हो कर दस समय की नमाज़ें कम कराईं, मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास फिर गुजरा, उन्होंने फिर यही राय जाहिर की, फिर बारगाहे इलाही में हाज़िर हुआ तो मुझे दस समय की नमाज़ का आदेश हआ, मैं वापस होने लगा तो फिर मूसा (अलैहिस्सलाम) ने वही कहा, अब बारगाहे इलाही में उपस्थित हुआ तो दैनिक पाँच समय की नमाज़ों का आदेश शेष रहा. मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास आया तो आपने कहा अब कितना कम हुआ?

*मैंने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को बताया कि दैनिक पांच बार की नमाज़ों का आदेश हुआ है।

– कहा कि आपकी उम्मत इसकी भी ताक़त नहीं रखती, मेरा तजरबा पहले लोगों से हो चुका है और इस्राइलियों का मुझे कड़वा अनुभव है, अपने रब के दरबार में फिर हाज़िर हो कर नमाज़ में कटौती के लिए निवेदन करें।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः मैंने अल्लाह सर्वशक्तिमान से सवाल कर चुका और अब मुझे शर्म आती है. अब मैं बस इसी पर राज़ी हूँ. आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि फिर जब मैं वहां से गुजरने लगा तो एक आवाज़ लगाने वाले ने आवाज़ लगाईः “मैं अपना आदेश जारी कर दिया, ऐ मुहम्मदः(स.) अब हर दिन और रात में पांच नमाज़ें ही हैं और हर नमाज़ दस नमाज़ों के बराबर है। अतः यह (गिनती में पांच हैं परन्तु पुण्य के एतबार से) पचास नमाज़ें हैं।” – (बुखारी, मुस्लिम)

Shab-e-Meraj, Isra Aur Meraj, Meraj Ka Waqia

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