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रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ें | Roza todne waali cheeze in hindi

वो 18 बातें जिस से रोज़ा टूटता और नहीं टूटता

इस पोस्ट में हम देख्नेगे के रोजा किन-किन चीजों से टूटता है और वो कौन कौन सी चीज़े है जिनकी वजह से रोज़ा नहीं टूटता।

इस पोस्ट में हम देख्नेगे के रोजा किन-किन चीजों से टूटता है और वो कौन कौन सी चीज़े है जिनकी वजह से रोज़ा नहीं टूटता।

01. एनेस्थेटिक इंजेक्शन से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Anesthetic injection se Roza Nahi Tut’ta • Being given medicine via injection does not break the fast


02. मेहंदी लगाने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Mehandi lagane se Roza Nahi Tut’ta

• Applying henna does not break the fast


03. मुँह और नाक से खून बहने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Mooh aur Naak se Khoon Behne se Roza Nahi Tut’ta

• Bleeding from a person does not affect the fast


04. ब्लड टेस्ट करवाने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Blood Test Karwane se Roza Nahi Tut’ta

• Blood Test does not affect the fast


05. आँखों में ऑय ड्रॉप्स डालने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Aankho me Eye Drops Dalne se Roza Nahi Tut’ta

• Eye Drops does not break the fast


06. शौहर और बीवी का एक दूजे को गले लगाने और चूमने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• बशर्ते के अहसासे क़ुरबत हमबिस्तरी का बायींस न बने

• Shohar aur Biwi ka Ek Duje ko Gale lagane aur Chumne se Roza Nahi Tut’ta (Basharte ke Ahsase Qurbat Humbistari ka Bayins na bane)

• Spouse hugging and kissing does not break the fast


07. इनहेलर सूंघने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Inhaler sunghne se Roza Nahi Tut’ta

• Using inhaler does not break the fast


08. नाक में दवाई डालने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Naak me Dawayi Dalne se Roza Nahi Tut’ta

• Nose drops does not break the fast


09. न्युट्रिशनल इंजेक्शन या फिर मुँह से लेने वाली दवाई से रोज़ा टूट जाता है

• Nutritional Injection ya fir Mooh se lene wali dawayi se Roza Toot jata hai.

• Nutritional injection and oral drugs breakes the fast


10. संभोग करने से रोज़ा टूट जाता है

• Humbistari se Roza Toot jata hai.

• Sexual intercourse breakes the fast


11. खुशबु लगाने और सूंघने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Khushbu Lagane aur Sunghne se Roza Nahi Tut’ta

• Smelling and applying Perfume does not break the fast


12. तैराकी और डाइविंग से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Paani me Tairane se Roza Nahi Tut’ta

• Swimming and Diving does not break the fast


13. खाना बनाते हुए चखने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Khana banate hue Chakhne se Roza Nahi Tut’ta

• Tasting Food does not break the fast


14. टूथपेस्ट करने या मुंह धोने से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Toothpaste karne ya Mouthwash se Roza Nahi Tut’ta

• Toothpaste and Mouth washing does not break the fast


15. खुद-बा-खुद उलटी आ जाये तो रोज़ा नहीं टूट’ता

• Khud-ba-khud Ulti Aa jaye to Roza Nahi Tut’ta

• Vomiting does not break the fast


16. जानभूझकर उलटी करने से रोज़ा टूट जाता है

• Janbhujkar Ulti Karne se Roza Toot Jata hai

• Vomiting Deliberately breakes the fast


17. स्वप्नदोष से रोज़ा नहीं टूट’ता

• Ahtlam se Roza Nahi Tut’ta

• Wet Dream does not break the fast


18. हस्तमैथुन से रोज़ा टूट जाता है

• Mustazani se Roza Toot jata hai

• Masturbation breakes the fast


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♫ Napaki ki Halat me kya Saher kar sakte hai?

Napaki ki Halat me kya Saher kar sakte hai?

Ramzan me Rozo ke liye Napaki ke halat me kya sehar karna durust hoga? Agar haa tou Gusl ka sahi wakt kounsa hai?

Tafseeli jankari ke liye is mukhtasar se Audio bayan ka muta'ala kare. jazakAllahu khairan kaseera.

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सेहरी और इफ्तारी की दुआ | Sehri aur Iftari ki Dua

सेहरी की दुआ, इफ्तारी की दुआ 2023 Ramzan , Sehri Roza Rakhne ki Niyat ki Dua in Hindi, Sehri ki Dua

Sehri wa Iftari ki Dua

सेहरी की दुआ

मुआशरे में सेहरी के नियत की जो दुआ मशहूर है वो हदीस से साबित नहीं। नियत दिल के इरादे का नाम है।

आपका सहरी के लिए उठना ही नियत में शुमार है। लिहाजा :

सेहरी के लिए किसी खास दुआ का एहत्माम करना जरुरी नहीं।

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Iftari ki Dua in hindi
Roza kholne ki Dua in Hindi

इफ्तारी की दुआ

इफ्तार बिस्मिल्लाह कह कर शुरू करे,  और इफ्तारी के बाद रोजा खोलने की ये दुआ पढ़ेः

ذَهَـبَ الظَّمَـأُ، وَابْتَلَّـتِ العُـروق، وَثَبَـتَ الأجْـرُ إِنْ شـاءَ الله

जहबज-जमाउ वबतल्लती उरुकु व सबतल-अजरु इंशा अल्लाह

प्यास खत्म हुई, रगे तर हो गयी और रोजे का सवाब इंशाअल्लाह पक्का हो गया।

📕 सुनन अबू दाऊद; हदीस: 2357

अल्लाह ताला हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे। आमीन

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मजदूर को पूरी मजदूरी देना



۞ हदीस: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया :





"मैं क़यामत के दिन तीन लोगों का मुक़ाबिल बन कर उन से झगडूंगा, (उन तीन में से एक) वह शख्स है जिसने किसी को मजदूरी पर रखा और उससे पूरा-पूरा काम लिया मगर उसको पूरी मजदूरी नहीं दी।"





📕 इब्ने माजाह : २४४२





खुलासा: मजदूर को मुकम्मल मजदूरी देना वाजिब है।



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असहाबे सुफ्फा



जब मस्जिदे नबवी की तामीर हुई, तो उस के एक तरफ चबूतरा बनाया गया था, जिस को सुफ़्फ़ा कहा जाता है।





यह जगह इस्लामी तालीम व तरबियत और तब्लीग व हिदायत का मरकज़ था, जो सहाबा (र.अ) यहाँ रहा करते थे, उन को "असहाबे सुफ्फा" कहा जाता है, इन लोगों ने अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत, रसूलुल्लाह (ﷺ) की खिदमत और कुरआन की तालीम हासिल करने के लिये वक्फ कर दिया था, उन का न कोई घर था और न कोई कारोबार।





आप (ﷺ) के पास कभी खाना आता तो इन लोगों के पास भेज देते थे और कभी खुद भी उन के साथ बैठ कर खाया करते थे। उन की तालीम के लिये पढाने वाले मुक़र्रर थे, जिन से वह लोग कुआने करीम सीखते और इल्मे दीन हासिल किया करते थे।





इसी लिये उन में अक्सर सहाबा कुरआन के बेहतरीन कारी थे, अगर कहीं इस्लाम की तब्लीग और, तालीम व तरबियत के लिये किसी को भेजने की जरूरत पेश आती, तो इन्हीं सहाबा में से किसी को भेजा जाता था।





रसूलुल्लाह (ﷺ) के जलीलुल कद्र सहाबी और हदीस को सबसे ज़ियादा रिवायत करने वाले हजरत अबू हुरैरा (र.अ) भी इन्हीं असहाबे सुफ्फा में थे।





📕 इस्लामी तारीख



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परिन्दों की परवरिश



चमगादड़ के अलावा तमाम परिन्दे अंडे देते हैं, वह उन पर बैठकर हरारत व गर्मी पहुंचाते हैं।





फिर कुछ दिनों के बाद उन अंडों से बच्चे निकल आते हैं, उन चूजों की गिजा के लिये अल्लाह तआला ने बेशुमार कीड़े मकोड़े पैदा कर दिये जिनको पकड़ कर परिन्दे अपने बच्चों के मुंह में डाल देते हैं।





जब उन के जिस्म में पर निकलने लगते हैं तो परिन्दे बड़ी आसानी के साथ खुद बख़ुद उड़ना सीख जाते हैं





आखिर उन परिन्दों को अंडों से बच्चे निकालने, परवरिश करने और उड़ने का सलीका कौन सीखाता है?





बेशक अल्लाह तआला ही ने अपनी कुदरत से उनकी पैदाइश और तरबियत व परवरिश का इन्तेजाम फ़रमाया है।





📕 अल्लाह की कुदरत



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मुहाजिर और अंसार में भाईचारा



मक्का के मुसलमान जब कुफ्फार व मुशरिकीन की तकलीफों से परेशान हो कर सिर्फ अल्लाह, उसके रसूल और दीने इस्लाम की हिफाजत के लिये अपना माल व दौलत, साज व सामान और महबूब वतन को छोड़ कर मदीना मुनव्वरा हिजरत कर गए। उस मौके पर रसूलल्लाह (ﷺ) ने उन मुसलमानों की दिलदारी के लिये आपस में भाई चारा कायम फ़रमाया।





और मुहाजिरीन (यानी वह सहाबा जो मक्का मुकर्रमा से हिजरत कर के मदीना चले गए) उनमें से एक एक को अन्सार (यानी वह सहाबा जिन्होंने मदीना मुनव्वरा में मुहाजिरीन की नुसरत व मदद की) उन का भाई बना दिया। अन्सार ने अपने मुहाजिर भाई के तआवुन और इज्जत व एहतेराम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और उनके साथ हमदर्दी व मुहब्बत, ईसार व कुर्बानी और मेहरबानी व हुस्ने सुलूक की ऐसी बेहतरीन मिसाल पेश की के आज तक पूरी दुनिया मिल कर उस जैसी मिसाल पेश नहीं कर सकी।





माल व दौलत, जमीन व बागात बल्के हर चीज़ में उन को शरीक कर लिया। मगर मुहाजिरीन ने भी अन्सारी भाइयों का हर मामले में साथ दिया और अपनी रोजी का बजाते खुद इंतजाम करने के लिये तिजारत वगैरा का पेशा भी इख्तियार किया।





बहरहाल यह रिश्त-ए-मुवाखात इस्लामी तारीख में इत्तेहाद व इत्तेफाक और कौमी यकजहती की ऐसी मिसाल थी, जिसने नस्ल व रंग, वतन व मुल्क और तहजीब व तमद्दुन के सारे इम्तियाज को अमली तौर पर खत्म कर डाला।





📕 इस्लामी तारीख



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शबे बरात से पहले मुआफ़ी मांगना कैसा?



शबे बरात से पहले मुआफ़ी मांगना कैसा ?





👉🏽 आजकल व्हाट्सऐप और फेसबुक पर शबे बारात के हवाले से लोग एक दूसरे से अपनी गलतियों की मुआफ़ी मांग रहे हे और ये समज रहे हे हमने मुआफ़ी का हक्क अदा कर दिया.!





🔅 इंसान के दो हक्क है एक हकुकुल्लाह और दुसरा हुकुकुल ईबाद🔅





👉🏽 एक अल्लाह(عَزَّوَجَلَّ) का हक्क है जैसे की… हमने नमाज़ नही पड़ी, रोज़ा नहीं रखा तो इस रात में आप अल्लाह(عَزَّوَجَلَّ) से मुआफ़ी मांगे अल्लाह(عَزَّوَجَلَّ) रहीम है मुआफ़ फरमा देगा.!





✒लैकीन किसी बन्दे का हक्क आपने दबाया, किसी का दील दुखाया या तक़लीफ पोहचाई तो उससे मिल कर मुआफ़ी मांग कर हक्क मुआफ़ नहीं करायेंगे तब तक अल्लाह(عَزَّوَجَلَّ) भी मुआफ़ नहीं करेंगा और अगर यहाँ मुआफ़ नहीं करवाया तो क़यामत में तमाम अपनी नेकिया हक़दार को देनी होगी और आप नेकियों के बा'वजूद ख़ाली होंगे फिर क़यामत का अंजाम आपके सामने है.!





👉🏽 और शरीयत का मसला है जो गुनाह ख़ुफ़िया हो उसकी तोबा और मुआफ़ी भी ख़ुफ़िया होगी और जो गुनाह एलानिया हो उसकी तोबा और मुआफ़ी भी एलानिया होगी व्हाट्सऐप और फेसबुक पे भेजने से मुआफ़ नहीं हो जायेगी.!





✒ यही वजह है के हमारे नबी-ऐ-करीम(ﷺ) का जब इस दनिया से जाने का वक़्त क़रीब आया तो आपने मदीना शरीफ के सारे लोगो को जमा कर के यही काम किया.!





👉🏽 हम आपसे गुज़ारीश करते है की… अगर आप को लगता है के फ़ला के साथ मैंने गलत किया शर्माये नहीं, नबी-ऐ-करीम(ﷺ) की सुन्नत पर अमल करते हुवे खुद उनके पास जाये और मुआफ़ी मांगे और मुआफ़ करवाये इसी में हमारी भलाई है.! इस नेक काम के लिए हमारा नफ़्स हमें रोकेगा, हमारा गुरुर और घमंड रोकेगा मगर हमें नफ़्स को हराना हे.!





✒ लेकिन कुछ हमारे ऐसे भाई हैं जो व्हाट्सऐप और फेसबुक पर ऐसे लोगों से माफी मांगते हैं जिनसे हमारा कोई ताल्लुक ही नहीं.!





👉🏽 मगर आजकल व्हाट्सऐप और फेसबुक पर अपनी गलतियों की मुआफ़ी मांगने की धूम मची है इसलिये की शबे बरात के दिन नामये आमाल तबदील होते है.! में तो ये कहता हुं की आप हर एक से मुआफ़ी मांगे.! और मुआफ़ी मांगनी भी चाहिये.! यक़ीनन इस में कोई शक नही की इस तरह मुआफ़ी मांगना भी सही व दुरुस्त है.! लेकिन अफ़सोस सद अफ़सोस…





➡️ जिनकी बे रुखी, गलत हरकतों और गंदे कामों से घर में माँ-बाप नाराज़ पड़े हैं.!
➡️ भाई-बहन, रिश्तेदार व पड़ोसी रूठे बैठे हैं.!
➡️ मोहल्ले वाले तंग व परेशान हैं.!





👉🏽 वो लोग माँ-बाप, भाई-बहन, रिश्तेदार व पड़ोसियों से मुआफ़ी मांग कर उन्हे राज़ी करने के बजाए, व्हाट्सऐप और फेसबुक के चंद रोज़ा अंजान दोस्तो से माफी मांगने और उन्हे मनाने में लगे हैं, अरे भाई.! जिनका हक्क पहले है, पहले उनसे तो मुआफ़ी मांग लो, पहले उन्हें तो राज़ी कर लो.!





इंशाअल्लाहुल अजीज़ , अल्लाह तआला हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे।





इस पोस्ट को ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहोचाये। जजाकल्लाह खैर।





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सब से बेहतरीन दवा



रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया: 





“सबसे बेहतरीन दवा कुरआन है।”





📕 इब्ने माजा: ३५३३





फायदा : उलमाए किराम फर्माते हैं के क़ुरआनी आयात के मफ़हूम के मुताबिक जिस बीमारी के लिए जो आयत मुनासिब हो, उस आयत को पढ़ने से इन्शा अल्लाह शिफा होगी और यह सहाब-ए-किराम का मामूल था।



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मुनक्का से पट्टे वगैरह का इलाज



हजरत अबू हिन्ददारी (र.अ) कहते हैं के -





रसूलुल्लाह (ﷺ) की खिदमत में मुनक्का का तोहफा एक बन्द थाल में पेश किया गया। आप (ﷺ) ने उसे खोल कर इर्शाद फर्माया: 





“बिस्मिल्लाह” कह कर खाओ! मुनक्का बेहतरीन खाना है जो पेटों को मजबूत करता है, पुराने दर्द को खत्म करता है, गुस्से को ठंडा करता है और मुंह की बदबू को जाइल करता है, बलगम को निकालता है और रंग को निखारता है।”





📕 तारीखे दिमश्क लि इब्ने असाकिर : ६०/२१



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हजरत सालेह (अलैहि सलाम) की दावत और कौम का हाल



हज़रत सालेह अलैहि सलाम हजरत हूद अलैहि सलाम के तकरीबन सौ साल बाद पैदा हुए।
कुरआन में उन का तजकिरा ८ जगहों पर आया है।





अल्लाह तआला ने उन्हें कौमे समूद की हिदायत व रहेनुमाई के लिये भेजा था। उस कौम को अपनी शान व शौकत, इज्जत व बड़ाई फक्र व गुरूर और शिर्क व बुत परस्ती पर बड़ा नाज़ था। हजरत सालेह (अ.) ने उन्हें नसीहत करते हुए फर्माया: ऐ लोगो ! तुम सिर्फ अल्लाह की इबादत करो उस के सिवा कोई बन्दगी के लाएक नहीं। वह इस पैगामे हक़ को सुन कर नफरत का इजहार करने लगे और हुज्जत बाज़ी करते हुए नुबुव्वत की सच्चाई के लिये पहाड़ से हामिला ऊँटनी निकालने का मुतालबा करने लगे।





हजरत सालेह (अ.)ने दुआ फरमाई, अल्लाह तआला ने मुअजिजे के तौर पर सख्त चटान से ऊँटनी पैदा कर दी, मगर अपनी ख्वाहिश के मुताबिक मुअजिज़ा मिलने के बाद भी इस बदबख्त कौम ने नहीं माना और कुफ्र व नाफरमानी की इस हद तक पहुँच गई के ऊँटनी को कत्ल कर डाला और इसी पर बस नहीं किया बल्के हजरत सालेह (अ.)के कत्ल का भी मन्सूबा बना लिया।





इस जुर्म-ऐ-अजीम और जालिमाना फैसले पर गैरते इलाही जोश में आई और तीन दिन के बाद एक जोरदार चीख और जमीनी जलजले ने पूरी कौम को तबाह कर डाला। इस के बाद हजरत सालेह (अ.)ईमानवालों के साथ फलस्तीन हिजरत कर गए।





तफ्सील में पढ़े : हज़रत सालेह अलैहि सलाम





📕 इस्लामी तारीख



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दीमक में अल्लाह की कुदरत



अल्लाह तआला ने बेशुमार मख्लूक़ पैदा फ़रमाई है। उन में एक अजीब नाबीना मख्लूख “दीमक” भी है।





वह नाबीना होने के बावजूद सर्दी और बारिश से बचने के लिये शानदार और मजबूत टावर नुमा घर बनाती है। जिस की ऊँचाई उन की जसामत से हजारों गुना ज्यादा होती है।





उन घरों के बनाने में वह मिट्टी और अपने लुआब व फ़ज्ला का इस्तेमाल करती हैं। उन के घरों में बेशुमार खाने होते हैं। जिन में भूल भूलय्याँ , छोटी छोटी नहरों के रास्ते और हवा के गुजरने का इन्तज़ाम होता है।





आखिर बीनाई से महरूम दीमक को टावर नुमा और शानदार घर बनाने की सलाहियत किसने अता फ़रमाई ? यक़ीनन यह अल्लाह ही की कारीगरी और उसी की कुदरत का करिश्मा है।





📕 अल्लाह की कुदरत



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जन्नती का दिल पाक व साफ होगा



कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:





"हम उन अहले जन्नत के दिलों से रंजिश व कदूरत को बाहर निकाल देंगे और उनके नीचे नहरें बह रही होंगी और वह कहेंगे के अल्लाह का शुक्र है, जिसने हम को इस मक़ाम तक पहुँचाया और अगर अल्लाह हम को न पहुँचाता, तो हमारी कभी यहाँ तक रसाई न होती।”





📕 सूरह आराफ: ४३



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इलाज करने वालों के लिये अहम हिदायत



रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:





“अगर किसी ने बगैर इल्म और तजुर्बे के इलाज किया तो कयामत के दिन उस के बारे में पूछा जाएगा।”





📕 अबू दाऊद: ४५८६





फायदा: मतलब यह है के अगर हकीम या डॉक्टर की ना तजरबा कारी और अनाड़ीपन की वजह से मरीज को तकलीफ पहुँचती है या वह मर जाता है तो ऐसे हकीम और डॉक्टर की कयामत के दिन गिरिफ्त होगी।



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शबे बराअत की हकीकत | सुन्नी इस्लाम



शबे बराअत / 15 शाबान की इबादतें ? क़ब्रिस्तान में चिरागाह ? रात की नमांजे ? हलवा पकाना ? रूहों की वापसी ?
१५ Shaban | Shab e Barat ki hakikat Quran aur sunnat ki roshni mein





۞ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम  ۞
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान बहुत रहमवाला है।





अल्लाह के नाम से जो सब तअरीफे अल्लाह तअला के लिए हैं हम उसी की तअरीफ करते है और उसी से मदद चाहते हैं।





अल्लाह की बेशुमार रहमतें, बरकतें और सलामती नाज़िल हो मुहम्मद सल्लललाहु अलैहि वसल्लम पर और आप की आल व औलाद व असहाब रज़ि. पर। अम्मा बअद!





आज मआशरे में आम आदमी के नज़दीक इस्लाम चन्द रस्मो रिवाज का नाम बन कर रह गया है। जिनमें एक यह भी है कि जब शअबान का महीना आए तो उसकी 15 वीं शब को जागा जाए। इस रात कुछ इबादत और कब्रों की ज़ियारत की जाए। हलवे पकाये जाएं। पटाखे छोड़े जाएं और आतिश बाजी का मज़ाहिरा किया जाए। क्या दीने इस्लाम का इन रस्मो-रिवाज से कोई तअल्लुक है ? या अल्लाह और उसके रसूल सल्ल. ने 15 शअबान की रात और दिन में जो हम करते या देखते आये है का हुक्म दिया है? इस पोस्ट के ज़रिये हम इन्शा अल्लाह यही जानने और समझने की कोशिश करेगें।





लैलतुल मुबारका (शबे क़द्र)





इर्शादे बारी तआला है -





”बेशक हमने इस कुरआन को शबे क़द्र में उतारा है। आपको मालूम है कि क़द्र वाली रात क्या है? शबे क़द्र हज़ार महीनों से भी बेहतर है। इस रात में फ़रिश्ते और रूह (जिब्रील अलैहि.) उतरते हैं, अपने रब से हर काम का हुक्म लेकर ।" (सुरह कद्र 97 आयत-1 से 4)





“बैशक! हमने इस (कुरआन) को एक मुबारक रात में नाज़िल किया । यकीनन लोगों को हम डराने वाले हैं। इसी रात में हर एक काम का फ़ैसला किया जाता है।” (दुखान 44 - 3, 4 )





"कुरआन रमज़ान के महीने में नाज़िल किया गया ।" (बकराः 2-185) 





शौकानी रह. कहते है कि "जमहूर उलैमा के नज़दीक लै-लतुल मुबारका से मुराद शबे कद्र है। जिसमें कुरआन नाज़िल किया गया और जो रमज़ान के आखिर अशरे (दहाई) की ताक रातों में से एक है ।'' (फह उल क़दीर - जिल्द 4 सफा 554)





१५ शाबान / शबे बरात के बारे में मशहूर हदीस का जायजा 





हालांकि कुछ लोग इस रात से 15 शअबान की रात मुराद लेते है और उसकी फ़ज़ीलत में कुछ अहादीस भी पेश करते हैं। जैसे -





1 . बनु कल्ब की बकरियों के बालों वाली हदीस  





आईशा रज़ि. से रिवायत है कि "मैनें एक रात अल्लाह के रसूल सल्ल. को गुम पाया तो में आपकी तलाश में निकली। मैंने देखा कि आप "बकी" में अपना सर आसमान की तरफ़ उठाये हैं। आप ने मुझ से फ़रमाया कि क्या तुम्हें इस बात का खौफ़ हुआ कि अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारी ख्यानत करके तुम पर जुल्म करेंगे। बाद में आप सल्ल. ने फ़रमाया कि " अल्लाह तआला शअबान की 15 वीं शब को आसमाने दुनिया पर नुजुल फरमाता है और क़बीला बनु कल्ब की बकरियों के बालों से ज़्यादा लोगों के गुनाहों को बख्शता है । " (तिर्मिज़ी - 636, इब्ने माजा - 1389)





वजाहत- इमाम तिर्मिर्ज़ी ने लिखा कि इमाम बुख़ारी इस हदीस को ज़ईफ कहते थे क्यों कि यहया बिन अबि कसीर का समाअ उर वाह बिन जुबैर से और हिजाज बिर अरताता का यहया बिन अब कसीर से साबित नहीं । यहया और हिजाज दोनों ने तदलीस की है । दारकृत्नी ने इस हदीस को गैर साबित कहा । 





2. १५ शाबान को नबी सल्ल. के लम्बे सजदे वाली हदीस 





आईशा रज़ि. फरमाती हैं कि रसूल सल्ल. शअबान की 15 वीं शब में खड़े होकर नमाज़ पढने लगे तो आपने इतना लम्बा सज्दा किया कि मुझे यह गुमान हुआ कि आप का इन्तेकाल हो गया। फिर आपने सज्दे से सर उठाया और जब नमाज़ से फारिग हुए तो फ़रमाया आज शअबान की 15 वीं शब है और इस शब में अल्लाह गुनाहों की माफी चाहने वालों की मगफिरत फरमाता है, रहम चाहने वालों पर नज़रे रहमत करता है और कीना परवर को उसके अपने हाल पर छोड़ देता है । (बैहकी)





वज़ाहत - यह रिवायत मुरसल है । (तोहफा अला हूज़ी जिल्द 2 सफा 52 ) इस हदीस के रावी अला बिन हारिस का आईशा रज़ि. से समाअ ( सुनना) साबित नहीं है यानि यह हदीस भी जईफ है





3. १५ शाबान को बन्दों के बख्शीश वाली हदीस





“बेशक! अल्लाह तआला शअबान की 15 वीं शब को अपने बन्दों की तरफ देखता है, जिसमें मुश्कि और कीना पर वर के अलावा सभी खुताकारों को बख़्श देता है।” (अबु मुसा अशअरी, इब्ने माजा-1390)





वज़ाहत - इब्ने माजा में यह हदीस दो सनदों से मरवी है और दोनों सनदें जुई हैं। पहली सनद वलीद बिन मुस्लिम की तदलीस, इब्ने अब्दुर्रहमान व अबु मूसा के बीच इन्केतअ की वजह से जईफ है। दूसरी सनद इब्ने लहिया के मुख़्तलित, जबीर बिन सलीम और अब्दुर्रहमान बिन अरज़ब के मजहूल और अबु मुसा रज़ि. से मुलाक़ात साबित न होने की वजह से ज़ईफ है।










१५ शबान का रोज़ा रखना कैसा है?





1. अल्लाह ताला के आसमाने दुनिया पर नुजुल फ़रमाने वाली हदीस 





अली रज़ि. बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फ़रमाया -





"जब शाबान की 15 वीं शब हो तो उसमें कयाम करो और 15 वीं तारीख को दिन में रोज़ा रखो क्योंकि अल्लाह तआला 15 वीं शब को सूरज छिपने के बाद से आसमाने दुनिया पर नुजुल फ़रमाता है और ऐलान करता है कि हे कोई मगफ़िरत चाहने वाला कि मैं उसे बख़्श दूं, है कोई रोज़ी का तालिब कि मैं उसे रोज़ी अता करूं और है कोई मुसीबत जदा जो मुसीबत से छुटकारा चाहता हो कि मैं उसे मुसीबत से छुटकारा दूं।” (इब्ने माजा-1388)





वज़ाहत - हाफिज़ इब्ने हजर कहते हैं कि उलेमा जिरह व तअदील ने इस हदीस के एक रावी अबु बकर बिन अबि सबरह को हदीसें गढ़ने वाला कहा । (तकरीब अल तहज़ीब जिल्द 1 सफा 410 ) अल्लामा ज़हबी और इमाम बुख़ारी ने ज़ईफ़ कहा। ( मीज़ान अल एतेदाल जिल्द 4 सफा 503 ) नसाई ने मतरूक कहा। इसी सनद में दो और रावी अहमद और इब्ने मोईन हैं जो हदीसें गढ़ा करते थे। (अल सुनन वल मुबतदिआत)





2. 60 साल के गुनाह माफ वाली हदीस





“जो 15 शअबान का रोज़ा रखे। उसके 60 साल गुज़िश्ता और 60 साल आइन्दा के गुनाह माफ किये जायेंगे।" (रावी - अली रज़ि., अल मौज़ आत जिल्द 2 सफा 130 - इब्ने जौज़ी )





वज़ाहत - इब्ने जौज़ी का बयान है कि यह हदीस मौजूअ (मन घड़त) है। इस हदीस को गढ़ने वाला मुहम्मद बिन महाजिर है, यह जो नाम भी पाता लिख देता था और ऐसे लोगों का ज़िक्र करता जो मजहूल और गैर मअरूफ हैं। अहमद इब्ने हम्बल ने भी कहा- यह हदीसें गढ़ता था ।





अल्लामा मुबारक पुरी लिखते हैं कि 15वीं शअबान के रोज़े के बारे में कोई मरफूअ हदीस सही या हसन या ऐसी जईफ रिवायत जिसका जौअफ मामूली हो, मरवी नहीं है । (मिरआत अल मातीह जिल्द 4 सफा 344)





लिहाज़ा सिर्फ 15 शअबान का रोज़ा सुन्नत समझ कर रखना बिदअत और ख़िलाफ़े सुन्नत है। अलबत्ता अगर कोई " अय्यामे बैद " 13, 14, 15, तारीख के रोज़े रखता हो तो इस दिन रोज़ा रखने में बुराई नहीं। इसलिए कि -





1. अबु ज़र रज़ि. से रिवायत है कि रसूल सल्ल. ने फ़रमाया “जब रोज़ा रखे तो महीने में तीन दिन रोज़े रख 13-14 और 15 तारीख में"। (तिर्मिज़ी - 658, नसाई-2408)





2. अबु हुरैरा रज़ि. से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फ़रमाया ‘’जब बाकी रह जाए आधा महीना शअबान का तो रोज़ा न रखो । (तिर्मिज़ी - 635, माजा - 1651)










15 वीं शाबान में ख़ास नमाज़े पढ़ना कैसा है ?





1. सौ रकात वाली हदीस 





जो शअबान की 15वीं शब में 100 रकअतों में 1000 दफा सूरह इखलास पढ़ेगा। फौत नहीं होगा हत्ता कि अल्लाह तआला उसके ख़्वाब में सौ फ़रिश्ते भेजेगा जो उसे जहन्नम से अमान में रखेंगे और तीन फ़रिश्ते भेजेगा जो उसे ख़ता से महफूज रखेंगे और बीस (20) फ़रिश्ते जो उसके दुश्मन से तदबीर करेंगे।" (इब्ने उमर रज़ि.)





वज़ाहत- इब्ने ज़ौज़ी और शौकानी फ़रमाते हैं यह रिवायत मनगढ़त है। इसके अक्सर रावी मजहूल हैं। इब्ने इराक और सुयुती रह. ने भी मौजूअ कहा । (किताब अल मौजूआत जिल्द 2 सफा 51)





2. क़यामत में दिल नहीं मरेगा वाली हदीस 





जिसने शअबान की 15वीं रात को ज़िन्दा किया (इबादत की) उस का दिल उस दिन नहीं मरेगा, जिस दिन के दिल मुर्दा हो जायेंगे ।" (करदूस रज़ि.) यह रिवायत सही नहीं है। इस का एक रावी मरवान बिन सालिम सच्चा नहीं। 





(अहमद) मतरूक है (नसाई व दारकुनी) दूसरा रावी सलमा बिन सुलैमान ज़ईफ़ है। ईसा बिन इब्राहीम मुन्कर अल हदीस है (बुखारी, नसाई और अब हातिम) यह हदीस मुन्कर है । ( मीज़ान जिल्द 3 सफा 308)





जिस हदीस में है के शअबान में अगले शअबान तक के सारे काम मुकर्रर कर दिये जाते है। यहां तक के निकाह, औलाद और मय्यत का होना भी । वह हदीस मुरसल है और ऐसी हदीसों से कुरआन का रद्द नहीं किया जा सकता । (तफसीर इब्ने कसीर जिल्द 5 सफा 62)










सलाते अलफिया ( हज़ारी नमाज़ ) की हकीकत 





1. यह नमाज़ सौ रकआत पढ़ी जाती है। इस नमाज़ की हर रकआत में सूरह फातिहा एक बार और सूरह इखलास दस दफा पढ़ी जाती है। इस नमाज़ का सबूत कुरआन या किसी भी सही हदीस में नहीं मिलता। इसलिए यह बिदअत है, और दींन में हर बिद्दत गुमराही है। 





2. सौ रकाअतों वाली नमाज़ - जिसने 15 शअबान की रात में सौ रकअतें पढ़ीं तो अल्लाह उसकी तरफ़ सौ फरिश्ते भेजेगा । तीस उसे जन्नत की बशारत देंगे। तीस उसे अज़ाबे जहन्नम से निजात दिलायेंगे । तीस उसे दुनिया की मुसीबतों से बचायेंगे और दस उसे शैतान से दूर रखेंगे।" यह रिवायत मनघड़त है। साहिबे कश्शाफ ने इसे बिना सनद के बयान किया है। 





मुल्ला अली कारी हनफी ने लिखा कि सौ रकअत वाली नमाज़ इस्लाम में चौथी सदी हिजरी के बाद गढ़ी गई । यह बैतुल मक़दिस में परवान चढ़ी और इसके सबूत के लिए हदीसें भी गढ़ी गई। (अल मौजूआत-सफा-440) 





जैसे - "जिसने 15 शअबान की रात में बारह रकअतें पढ़ी और हर रकअत में तीस दफा सूरह इखलास पढ़ी। तो मरने से पहले जन्नत में उसका ठिकाना उसे दिखाया जायेगा और उसके घर वालों में से ऐसे दस लोगों के बारे में उसकी सिफारिश कुबुल की जायेगी। जिन पर जहन्नम वाजिब हो चुकी होगी ।” (अबु हुरैरा रज़ि.) 





इब्ने जौज़ी कहते हैं कि यह हदीस मौजूअ है। इसके रूवात मजहूल हैं। इमाम सुयुती, इब्ने हजर और इब्ने इराक़ ने भी मौजूअ क़रार दिया है। (अललमु त नाहिया जिल्द 1 सफा 70)










सलातुर्रगाइब पढ़ना कैसा ?





हाफ़िज़ इराक़ी ने कहा - 15 शअबान की रात की नमाज़ वाली हदीस मन घड़त और झुठी है। (अल मुन्करात - सफा -74) 





इमाम नौवी रह. (अल मजमूआ शरह अल मुहज़्ज़्ब जिल्द 4 सफा 56 ) पर लिखते हैं कि जो नमाज़ सलातुर्रगाइब के नाम से मशहूर है। उसका ज़िक्र कुव्वतुल कुलूब और अहया अल उलूम में आ जाने से धोखा न खाएं। 





इमाम मुकद्दसी ने इस नमाज़ को बातिल करार दिया और कहा- इस नमाज़ का वजूद 448 हिजरी में हुआ ।





इब्ने तिमिया रह. ने लिखा कि यह ऐसी नमाज़ है जिसे न नबी सल्ल. ने पढ़ा, न सहाबा रज़ि. ने और न ही ताबईन रह. ने। (अल मुन्करात जिल्द 4 सफा - 57)





इन नमाज़ों के बारे में जो रिवायतें आई हैं, वह सब मौजूअ ( मन घड़त ) हैं । (दुर्रे मुख़्तार - जिल्द 2 सफा - 48 )










शबे बराअत का हलवा





इस दिन कुछ लोग हलवा बनाते, खाते और खिलाते भी हैं और इसकी वजह आप सल्ल. के जंगे उहद में दनदाने मुबारक की शहादत पर आप सल्ल. का हलवा खाना बतलाते हैं तो कोई इसे हमज़ा रज़ि. की शहादत पर उनकी फातिहा का नाम देता है जबकि मोर्रेखीन का अजमाअ है कि 'जंगे उहद' शव्वाल तीन हिजरी में हुई। कोई कहता है कि चूंकि उवैस करनी रह. ने आप सल्ल. के दातों की शहादत के सदमे और आप सल्ल. की मुहब्बत में अपने सारे दांत तोड़ लिये थे और हलवा खाया था।





हालांकि तारीखी रोशनी में यह सारी बातें गलत हैं। अजीब बात यह है कि हलवा खाना सब पसन्द करते हैं लेकिन आप सल्ल. की मुहब्बत में अपने दांतो को शहीद कराना कोई नहीं चाहता।










शबे बरात में चिराग़ा





कुछ लोग इस रात में मस्जिदों, घरों और बाज़ारों और कब्रिस्तानों में चिरागा करते हैं। जबकि ऐसा करना ना आप सल्ल. से साबित है और न सहाबा रज़ि. से बल्कि इस रात में रोशनी करना बरमकियों की ईजाद है जो बातनी फिर्के से थे।










रूहों की वापसी का अक़ीदा





कुछ लोगों का यह अक़ीदा है कि शअबान की 15 वी शब में मुर्दो की रूहें घर आती हैं। इसलिए उन रूहों का इस्तकबाल करने के लिए घरों को सजाते हैं, रोशनी करते हैं और हलवे वगैरह पर फातिहा लगा कर उसका सवाब उन रूहों को पहुंचाते हैं। हालांकि इस अमल का सबूत कुरआन व हदीस में क़तई नहीं है। 





अल्लाह तआला का इर्शाद है -
"मरने के बाद वह (रूहे) ऐसे आलमे बरज़ख़ में हैं कि क़यामत तक दुनिया में पलट कर नहीं आ सकते।" 
(मूमिनून 23-16, 100, यासीन 36-31, जुमर 39-42, गाफिर 40-11 तक्वीर 81-7) 





इसलिए भी कि “मोमिनीन की रूह इल्लीयीन में (तत्फीफ 83 - 18 ) और ‘“काफ़िरों की रूहें सिज्जीन में " ( तत्फ़ीफ़ 83 - 7) रहती हैं।










कब्रिस्तान की ज़ियारत





कब्रों की ज़ियारत के लिए कबिस्तान जाते रहना आप सल्ल. की सुन्नत है। कब्रिस्तान की ज़ियारत करने से मौत की याद आती है। इस दुनिया से बेरगुबती बढ़ती है। नेक काम करने को दिल चाहता है। मुर्दो के लिए दुआ की जाती है, जिससे मुर्दो को फायदा पहुंचता है। लेकिन कब्रों की ज़ियारत के लिए इस रात को ख़ास कर लेना कुरआन या किसी सही हदीस से साबित नहीं।  कुछ लोग अपने इस अमल के लिये हज़रते आयशा रजि. से मैरवी हदीस (तिर्मिज़ी) से दलील पकड़ते हैं जो सही नहीं । इसलिए कि यह रिवायत सख़्त जईफ है। खुद इमाम तिर्मिज़ी रह. ने कहा कि इमाम बुखारी रह भी इस हदीस को जईफ़ कहते थे।










शबे बराअत की हक़ीक़त





शब फारसी ज़बान का लफ्ज़ है और बराअत अरबी का। अगर दीन में इसकी कोई असल होती तो इसका नाम "लैलतुल बराअत" होता । बराअत के मअनी नफ़रत और बेज़ारी जाहिर करने के होते हैं जैसा कि सूरह तौबा की एक आयत में है और 'शब' रात को कहा जाता है। इस तरह 'शबे बराअत' का मतलब 'नफरत और बेज़ारी जाहिर करने वाली रात " होती है। 





मुस्लिम कहलाने वाला एक फ़िक़ इस रात में अपने फर्ज़ी (बारहवें ) इमाम की पैदाइश की खुशी मनाते है और सहाबा इकराम रज़ि. खुसुसन अबु बकर रज़ि., उमर रज़ि., और उसमान रज़ि. से बेज़ारी ज़ाहिर करता है। इस फिर्के का अकीदा है कि "इमाम महदी" इस रात में पैदा हुए थे और वह किसी गार में रूपोश हैं। वहीं से कयामत से पहले ज़ाहिर होंगे।





इस मुल्क में बहुत से दीनी अफ़कार हमें बादशाहों के ज़रिये मिले हैं। इस रात की अहमियत भी उन्हीं में से एक है । 





लेबल हमारी अकीदत का लगाया गया और काम अपना लिया गया और लोग ला इल्मी या कम इल्मी की वजह से इस दिन व रात की फ़ज़ीलत को गुज़रते वक्त के साथ सच समझने लगे। जबकि यह बेकद्र की रात है, न ही इस रात फ़रिश्ते उतरते हैं और न ही रूहें आती हैं।





कारी अब्दुल बासित साहब लिखतें हैं ‘सही बात यह कि दीने इस्लाम में ‘“शबे बराअत" का कोई तसव्वुर नहीं और शअबान की 15वीं शब के सिलसिले में पाई जाने वाली तमाम रिवायतें जईफ और कमज़ोर हैं । बअज़ मुहद्देसीन अगर चे फ़ज़ाइले आमाल के सिलसिले में जईफ रिवायतों को कुबूल करते है और उन पर अमल करने को दुरूस्त मानते हैं लेकिन मुतलकन नहीं बल्कि शराइत के साथ । 





जईफ़ रिवायतों की बुनियाद पर किसी चीज़ को दीन में इस्तेहबाब का दर्जा देना सही नहीं है च जाय के उस की वजह से किसी चीज़ को फ़र्ज़ या वाजिब या अरकाने इस्लाम वगैरह का दर्जा दे दिया जाए और उसका ऐसा इल्तेज़ाम किया जाए जैसा कि फ़र्ज़ व वाजिब के साथ किया जाना चाहिये।” (उर्दू न्यूज़-जद्दा)





अल्लाह तआला हमें हक़ बात कहने, सुनने, मानने और उस पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए ।
हमें अपने दीन की सीधी राह पर चलाए और हर तरह की बिद्दत से बचाए । आमीन।





अहले इल्म हज़रात अगर कहीं गल्ती पाएं तो जरूर हमारी इस्लाह फरमाएं ।





शुक्रिया। वस्सलाम





आपका दीनी भाई
✒️मुहम्मद सईद मो. 0921483456



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