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सबसे ज्यादा आज़माइश किन लोगों की हुई?

हदीसे नबवी ﷺ

सबसे ज्यादा आज़माइश किन लोगों की हुई?

हज़रत मुसब बिन साद रज़िअल्लाहु अन्हु फरमाते हैं के, मैंने रसूलल्लाह ﷺ से दरियाफ्त किया: या रसूलल्लाह! सब से ज्यादा आजमाइश में किन लोगों को डाला जाता है?

आप ﷺ ने इरशाद फरमाया: “अंबिया अलैहि सलाम को, फिर उसे जो अंबिया से करीबतर हो, फिर उसे जो अंबिया से करीब हो। (यानी जो अंबिया से जितना ज्यादा कुर्ब ओ ताल्लुक रखेगा उसे उतना ही ज्यादा आज़माया जाएगा)।

आदमी को उसके दीन के मुताबिक आज़माया जाता है, पस अगर वो अपने दीन में पुख़्ता हो तो उसकी आज़माइश भी कड़ी होती है और अगर उसके दीन में कमज़ोरी हो तो उसे उसके दीन के मुताबित ही आज़माइश में डाला जाता है।

आज़माइश बंदे के साथ हमेशा रहती है यहां तक के उसे (गुनाहों से ऐसा साफ) कर के छोड़ती है कि वो ज़मीन पर ऐसी हालत में चलता फिरता है के उस पर कोई गुनाह बाकी नहीं रहता।”

📕 जामे अत तिरमिझी, हदीस 284

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दुआएँ हिंदी में | Dua in Hindi

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जानिए: क्या मुसलमान काबे की पूजा करते है ?

सवाल: कुछ लोग कहेते है की मुस्लिम काबे की पूजा करते है, क्या ये सही है ?

» जवाब: ‘काबा’ किबला है अर्थात् वह दिशा जिधर मुसलमान नमाज़ के समय अपने चेहरे का रुख़ करते हैं। यह बात सामने रहनी चाहिए कि यद्यपि मुसलमान अपनी नमाज़ों में काबा की तरफ़ अपना रुख़ करते हैं लेकिन वे काबा की पूजा नहीं करते। मुसलमान एक अल्लाह के सिवा किसी की पूजा नहीं करते और न ही किसी के सामने झुकते हैं।

क़ुरआन में कहा गया है -

"हम तुम्हारे चेहरों को आसमान की ओर उलटते-पलटते देखते हैं। तो क्या हम तुम्हारे चेहरों को एक किब्ले की तरफ़ न मोड़ दें, जो तुम्हें प्रसन्न कर दे। तुम्हें चाहिए कि तुम जहाँ कहीं भी रहो अपने चेहरों को उस पवित्र मस्जिद की तरफ़ मोड़ लिया करो।"

📕 क़ुरआन, 2:144

1. इस्लाम एकता की बुनियादों को मज़बूत करने में विश्वास करता है -

नमाज़ पढ़ते वक़्त यह संभव था कि कुछ लोग उत्तर की ओर अपना रुख़ करते और कुछ दक्षिण की ओर। एक मात्र वास्तविक स्वामी की इबादत में मुसलमानों को संगठित करने के लिए यह आदेश दिया कि चाहे वे जहाँ कहीं भी हों, वे अपने चेहरे एक ही दिशा की ओर करें अर्थात् काबा की ओर।

यदि कुछ मुसलमान ‘काबा’ के पश्चिम में रहते हैं तो उन्हें पूर्व की ओर रुख़ करना होगा। इसी प्रकार अगर वे ‘काबा’ के पूर्व में रह रहे हों तो उन्हें पश्चिम की दिशा में अपने चेहरे का रुख़ करना होगा।

2. ‘काबा’ विश्व-मानचित्र के ठीक मध्य में स्थिति है -

सबसे पहले मुसलमानों ने ही दुनिया का भौगोलिक मानचित्र तैयार किया। उन्होंने यह मानचित्र इस प्रकार बनाया कि दक्षिण ऊपर की ओर था और उत्तर नीचे की ओर। काबा मध्य में था।

आगे चलकर पाश्चात्य के मानचित्र-रचयिताओं ने दुनिया का जो मानचित्र तैयार किया वह इस प्रकार था कि पहले मानचित्र के मुक़ाबले में इसका ऊपरी हिस्सा बिल्कुल नीचे की ओर था, अर्थात् उत्तर की दिशा ऊपर की ओर और दक्षिण की दिशा नीचे की ओर। इसके बावजूद काबा दुनिया के मानचित्र में केन्द्रीय स्थान पर ही रहा।

3. ‘काबा’ का तवाफ़ (परिक्रमा)ईश्वर के एकत्व का प्रतीक है -

मुसलमान जब मक्का में स्थित मस्जिदे-हराम (प्रतिष्ठित मस्जिद) जाते हैं तो वे काबा का तवाफ़ करते हैं। यह कार्य एक ईश्वर में विश्वास रखने औ रएक ही ईश्वर की उपासना करने का प्रतीकात्मक प्रदर्शन है, क्योंकि जिस तरह गोल दायरे का एक केन्द्रीय बिन्दु होता है उसी तरह ईश्वर भी एक ही है जो पूजनीय है।

4. हज़रत उमर (रजि़॰) का बयान -

काबा में लगे हुए ‘हजरे-अस्वद’(काले पत्थर) से संबंधित दूसरे इस्लामी शासक हज़रत उमर (रजि़॰) से एक कथन इस्लामी इतिहास में उल्लिखित है। हदीस की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सहीह बुख़ारी’ भाग-दो, अध्याय-हज, पाठ-56, हदीस न॰ 675 के अनुसार हज़रत उमर (रजि़॰) ने फ़रमाया, "मुझे मालूम है कि (हज़रे-अस्वद) तुम एक पत्थर हो। न तुम किसी को फ़ायदा पहुँचा सकते हो और न नुक़सान और मैंने अल्लाह के पैग़म्बर (सल्ल॰) को तुम्हें छूते (और चूमते) न देखा होता तो मैं कभी न तो तुम्हें छूता (और न ही चूमता)।"

5. लोग काबा पर चढ़कर अज़ान देते थे -

ख़ुदा के पैग़म्बर (हज़रत मुहम्मद सल्ल॰) के ज़माने में तो लोग काबा पर चढ़कर अज़ान देते थे। यह बात इतिहास से सिद्ध है। कोई भी मूर्तिपूजक मूर्ति पर चढ़कर खड़ा नहीं होता।

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गुमशुदा चीज़ उठाकर अपने पास रखने का गुनाह: हदीस

Gumshuda cheez uthakar apne paas rakhne ka gunah Hadees

गुमशुदा चीज़ उठाकर अपने पास रखने का गुनाह

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया:

"जो शख़्स गुमशुदाह चीज़ उठाके अपने पास रखे और उस (गुमशुदा चीज़) को (लौटाने के नियत से लोगो में) ऐलान ना करे तो वो शख़्स गुमराह है।"

📕 सहीह मुस्लिम, हदीस 4402

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अल्लाह के रसूल (ﷺ) गवाही देंगे, ए मेरे रब! मेरी कौम ने कुरान को छोड़ दिया

जानिए: रसूलअल्लाह (ﷺ) रोज़े क़यामत क्यों और किसके खिलाफ गवाही देंगे कि “ए मेरे रब! मेरी कौम ने कुरान को छोड़ दिया।"

आज अल्लाह की किताब (कुरआन-ए-मजीद) से उम्मते मुस्लिमा को दूर करने के लिए ना जाने क्या-क्या हथकंडे इस्तेमाल किए जाते हैं, बाज़ पेड उलेमाओ के जरीए फतावे तक दिए जा रहे हैं के "कुरान पढ़े तौ गुमराह हो जाओगे" नौउजुबील्लाह!

जबकी कुरान से दूरी इख्तियार करने वाले रसूलअल्लाह (ﷺ) की नाराजगी के मुस्तहिक होंगे! बल्की रसूलअल्लाह इनके खिलाफ बात करेंगे जिसके तालुक से अल्लाह रब्बुल इज्जत क़ुरआन में बयान फरमाया -

RasoolAllah Gawahi Denge

(अल्लाह के रसूल तुम्हारे ख़िलाफ़ गवाही देंगे और कहेंगे) "ऐ मेरे रब इस क़ौम ने कुरआन को छोड़ दिया" [सूरह फुरकान: 25:30]


तो यहाँ नबी-ए-करीम (ﷺ) देखिये ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ बात करेंगे और कहेंगे के “ऐ अल्लाह! मेरी क़ौम ने कुरआन को छोड़ दिया।”

अंदाज़ा लगाइए जिस नबी-ए-रहमत के तालुक से हम उम्मीद रखते हैं के आप हमारी सिफ़ारिश करेंगे, अल्लाह से शफ़ाअत करेंगे हमारी रोज़े महशर के मुकाम में, (यकीनन करेंगे) लेकिन यही नबी खिलाफ खड़े हो जाएंगे ऐसे लोगों के जो क़ुरान की हिदायत पर गौर नहीं करते, और नहीं इसपर अमल करते थे।

तौ बहरहाल अगर हम चाहते हैं कि सच में नबी-ए-करीम (ﷺ) की शफा-अत नसीब हो तो हमें चाहिए के अल्लाह की हिदायत कुरान-ए-मजीद से अपना रिश्ता जोड़ ले।

इसके माने मफहूम को समझने की, इसके पैगाम पर गौर करने की तलब हम इख्तियार करे।

फ़िर इंशाअल्लाह-उल-अज़ीज़! ये किताब सरापा हमें अल्लाह की हिदायत से जोड़ देगी।

और अगर हमने ऐसा ना किया, तौ बेहरहाल ला-इल्मी किस हद तक हमें नुक्सान पहुंचाती है हम देख ही रहे हैं। (अल्लाह बचाए हमें जहालत के फितनो से!)

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से दुआ है के -

۞ अल्लाह हमें कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे, ۞ हम तमाम के लिए कुराने मजीद को पढ़ना, समझना और उसपर अमल करना आसान फरमाये।

۞ जब तक हमने जिंदा रखे इस्लाम और ईमान पर जिंदा रखे। ۞ खात्मा हमारा ईमान पर हो।

۞ वा आख़िरु दावाना अनिलहम्दुलिल्लाहे रब्बिल आ'लमीन !!!

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अज़ान का जवाब दे कर दुआ करने की फ़ज़ीलत

एक आदमी ने अर्ज किया: "या रसूलल्लाह (ﷺ) ! मोअज्जिन हज़रात फजीलत में हम से आगे बढ गए।

रसुलल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

"तुम भी इसी तरह अज़ान का जवाब दिया करो, जिस तरह वह अजान देते है फिर जब तुम फारिग़ हो जाओ तो अल्लाह तआला से दुआ करो, तुम्हारी दुआ पूरी होगी!"

📕 अबू दाऊद : ५२४

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बीमार पुरसी के वक़्त की दुआ

रसूलुल्लाह (ﷺ) जब किसी बीमार की इयादत के लिये जाते या आप (ﷺ) की खिदमत में बीमार को हाज़िर किया जाता तो आप यह दुआ पढ़ते:

 اَللَّهُمَّ رَبَّ النَّاسِ مُذْهِبَ الْبَاسِ اشْفِ أَنْتَ الشَّافِيْ لَا شَافِيَ إِلَّا أَنْتَ شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًا

ALLAHumma Rabbannasi Muzhibal-baasi-shfee Antashhaafi La Shaafi Illa Anta Shifa-an La Yughaadiru Saqama

तर्जमा : “ऐ अल्लाह! लोगों के रब्ब! बीमारी को दूर करने वाले! शिफ़ा ‘अता फरमाए| तू ही शिफ़ा देने वाला है। तेरे सिवा कोई शिफ़ा देने वाला नहीं। ऐसी शिफ़ा ‘अता फरमा के जिसके बाद बीमारी बाक़ी न बचे।”

📕 बुखारी: ५६७५, अन आयशा (र.अ)

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जन्नत में दाखले के लिये ईमान शर्त है

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

"जिस शख्स की मौत इस हाल में आए, के वह अल्लाह तआला पर और क़यामत के दिन पर ईमान रखता हो, तो उससे कहा जाएगा, के तूम जन्नत के आठों दरवाज़ों में से जिस से चाहो दाखिल हो जाओ।"

📕 मुसनदे अहमद : ९८

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क्या आप जानते हैं कि सुअर का मांस हराम क्यों है? 🤔🚫 | Why is Pork Haram?

इस्लाम में सुअर का माँस खाना वर्जित(हराम) होने की बात से सभी परिचित हैं। निम्नलिखित तथ्यों द्वारा इस प्रतिबन्ध की व्याख्या की गई है।

1). सुअर के मांस का निषेध पवित्र कुरआन में:

पवित्र क़ुरआन में कम से कम चार स्थानों पर सुअर का मांस खाने की मनाही की गई है। पवित्र क़ुरआन की सूरह 2 आयत 173, सूरह 5 आयत 3, सूरह 6 आयत 145, सूरह 16 आयत 115 में इस विषय पर स्पष्ट आदेश दिये गए है। पवित्र कुरआन की निम्न आयत इस बात को स्पष्ट करने के लिए काफी है, कि सुअर का मांस क्यों हराम किया गया है।

तुम्हारे लिए (खाना) हराम (निषेध) किया गया मुर्दार, खून, सुअर का मांस और वह जानवर जिस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो।

कुरआन 5:3

इस संदर्भ में पवित्र क़ुरआन की सभी आयतें मुसलमानों को संतुष्ट करने हेतु पर्याप्त है, कि सुअर का मांस उनके लिए हराम है।


2). बाइबल ने भी सुअर का मांस खाने की मनाही की है:

संभवतः ईसाई लोग अपने धर्मग्रंथ में तो विश्वास रखते ही होंगे। बाइबल में सुअर का मांस खाने की मनाही इस प्रकार की गई है।

» और सुअर को, क्योंकि उसके पाँव अलग और चिरे हुए हैं। पर वह जुगाली (Rumination/पागुर) नहीं करता, वह भी तुम्हारे लिये अपवित्र है, तुम उनका मांस न खाना, उनकी लाशो को न छूना, वह तुम्हारे लिए अपवित्र हैं। - (ओल्ड टेस्टामेंट, अध्याय 11, 7 से 8)

कुछ ऐसे ही शब्दों के साथ ओल्ड टेस्टामेंट की पाँचवी पुस्तक में सुअर खाने से मना किया गया है।

» और सुअर तुम्हारे लिए इस कारण से अपवित्र है कि इसके पाँव तो चिरे हुए हैं परन्तु वह जुगाली नहीं करता, तुम न तो उनका माँस खाना और न उनकी लाशों को हाथ लगाना। - (ओल्ड टेस्टामेंट, अध्याय 14 : 8)


3). सुअर के मांसाहार से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं:

अब आईए ! ग़ैर मुस्लिमों और ईश्वर को न मानने वालों की ओर । उन्हें तो बौद्धिक तर्क, दर्शन और विज्ञान के द्वारा ही संतुष्ट किया जा सकता है।

सुअर का मांस खाने से कम से कम 70 विभिन्न रोग लग सकते हैं। एक व्यक्ति के उदर में कई प्रकार के कीटाणु हो सकते हैं, जैसे राउण्ड वर्म, पिन वर्म और हुक वर्म इत्यादि। उनमें सबसे अधिक घातक टाईनिया सोलियम (Taenia Soliam) कहलाता है।

सामान्य रूप से इसे टेपवर्म या फीताकृमि भी कहा जाता है। यह बहुत लम्बा होता है और आंत में रहता है। इसके अण्डे रक्त प्रवाह में मिलकर शरीर के किसी भी भाग में पहुंच सकते हैं। यदि यह मस्तिष्क तक जा पहुंचे तो स्मरण शक्ति को बहुत हानि पहुंचा सकते हैं।

यदि दिल में प्रवेश कर जाए तो दिल का दौरा पड़ सकता है। आँख में पहुंच जाए तो अंधा कर सकते हैं। जिगर में घुसकर पूरे जिगर को नष्ट कर सकते हैं। इसी प्रकार शरीर के किसी भाग को हानि पहुंचा सकते हैं। एक अन्य अत्यन्त घातक कृमि (कीड़ा) Trichura Tichurasis है।

यह एक सामान्य भ्रांति है कि यदि सुअर के मांस को भली भांति पकाया जाए तो इन रोगाणुओं के अण्डे नष्ट हो जाएंगे। अमरीका में किये गए अनुसंधान के अनुसार ट्राईक्योरा से प्रभावित 24 व्यक्तियों में 20 ऐसे थे जिन्होंने सुअर का माँस अच्छी तरह पका कर खाया था।

इससे पता चला कि सुअर का मांस अच्छी तरह पकाने पर सामान्य तापमान पर भी उसमें मौजूद रोगाणु नहीं मरते जो भोजन पकाने के लिए पर्याप्त माना जाता है।


4). सुअर के मांस में चर्बी बढ़ाने वाला तत्व होता है।

सुअर के मांस में ऐसे तत्व बहुत कम होते हैं, जो मांसपेशियों को विकसित करने के काम आते हों। इसके विपरीत यह चर्बी से भरपूर होता है।

यह वसा रक्त नलिकाओं में एकत्र होती रहती है, और अंततः अत्याधिक दबाव (हाइपर टेंशन) ओर हृदयघात का कारण बन सकती है।

अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि 50 प्रतिशत से अधिक अमरीकियों को हाइपर टेंशन का रोग लगा हुआ है।


5). सुअर संसार के समस्त जानवरों से अधिक घिनौना जीव है:

सुअर संसार में सबसे अधिक घिनौना जानवर है। यह गंदगी, मैला इत्यादि खाकर गुज़ारा करता है। मेरी जानकारी के अनुसार यह बेहतरीन सफ़ाई कर्मचारी है, जिसे ईश्वर ने पैदा किया है।

वह ग्रामीण क्षेत्र जहाँ शौचालय आदि नहीं होते और जहाँ लोग खुले स्थानों पर मलमूत्र त्याग करते हैं, वहाँ की अधिकांश गन्दगी यह सुअर ही साफ़ करते हैं।

कुछ लोग कह सकते हैं कि आस्ट्रेलिया जैसे उन्नत देशों में सुअर पालन स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण में किया जाता है।

परन्तु इतनी सावधानी के बावजूद कि जहाँ सुअरों को बाड़ों में अन्य पशुओं से अलग रखा जाता है, कितना ही प्रयास कर लिया जाए कि उन्हें स्वच्छ रखा जा सके किन्तु यह सुअर अपनी प्राकृतिक प्रवत्ति में ही इतना गन्दा है कि उसे अपने साथ के जानवरों का मैला खाने में ही आनन्द आता है।

Suar Ka Gosht, Pork, Why is Pork Haram?

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माँ की नाफरमानी की सजा! अल्लाह के वली का इबरतनाक वाकिआ | Story of Juraij (Rh.) and his Mother

वालिदैन की इता'अत क्या दर्ज़ा रखती है और इनकी नाफ़रमानी का नातीज़ा क्या होता है चाहे इंसान कितना ही नेक हो। आइये इसके ताल्लुक से एक वाकिये पर गौर करते हैं।

माँ की नाफरमानी की सजा! अल्लाह के वली का इबरतनाक वाकिआ

रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फरमाते हैं के: “हमसे पिछली उम्मत में एक नेक शख़्स थे जो अल्लाह के वली थे, जिनका नाम जुरैज़ था। उन्होन एक गिरजा तामीर किया था और उसमें वो अल्लाह की इबादत किया करते थे, नमाज अदा करते थे।

एक मरतबा हुआ यूं कि जुरैज अपनी नमाज में थे तब उनकी वालिदा (माँ) आई और उन्हें आवाज दी के "ऐ जुरैज, ऐ जुरैज आओ मैं तुमसे मिलने आई हूं।"

जुरैज नमाज पढ़ रहे थे जो कि नफली नमाज थी, उन्होंने सोचा के नमाज मुकम्मिल कर के ही वालिदा से जा कर मिल लेता हूं। लेकिन नमाज़ ख़तम होने तक वालिदा नाराज़ होकर चली गई।

फ़िर दूसरी मरतबा यहीं हुआ। इस बार भी वालिदा ने आवाज़ दी “ऐ जुरैज़! ऐ जुरैज़! मैं मिलना चाहती हूँ तुमसे” जुरैज फिर अपनी नमाज में लगे हुए, सोचा के अपनी नमाज मुकम्मल कर लेता हूं और फिर जाकर मिल लूंगा।

तिसरी मरतबा भी यही हुआ। वालिदा फिर आई और जुरैज को आवाज दी, जुरैज इस वक्त भी अल्लाह की इबादत में थे, और मां नाराज हो गई फिर कहा के “ऐ जुरैज! तू तवायफ़ो का मुँह देखे” ऐसी बद-दुआ देकर वहा से चली गई।

आगे आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फरमाते हैं: जुरैज की जो मकबूलियत थी, इनकी जो इबादत थी इस से लोग जलते थे और लोग वैसे ही जुरैज पर इल्जाम लगाना चाहते थे। लिहाजा कौम के शर्र पसंद लोगो ने एक मनसूबा किया, उन्होने एक बुरी (फाहेशा) औरत को तैयार किया जो लोगों से मुह काला करती थी।

उस औरत ने जुरैज के गिरजा के बाहार एक चरवाहा था उससे अपना मुंह काला करती रही, जिस से उसको हमल ठहर गया और उससे एक औलाद हुई जो ज़िना की थी। जब उसको एक औलाद हुई तो औरत ने लोगों से कहा के “ये औलाद जुरैज की है।”

जब बस्ती में ये बात चली तो लोगों ने आकार जुरैज़ को बेताहाशा मारना शुरू कर दिया, हत्ता के उसका गिरजा भी तोड़ दिया और मारते-मारते उसे बादशाह (वक्त के हाकीम) के पास ले गए।

जब वहा पूछा तो जुरैज ने कहा के “बताओ तो सही क्यों मारते हो?”

लोगों ने कहा के "तुम्हें एक औलाद है, तुमने मुंह काला किया है किसी औरत के साथ।"

तो जुरैज ने कहा के 'उसे लाओ तो सही, वो औरत कौन है।' (जुरैज़ की वालिदा की बद्दुआ हुई और जुरैज़ को बुरी औरत का मुंह देखना पड़ा।)

जुरैज ने कहा ठीक है मुझे नमाज पढ़ने दो, उन्होंने दो रकात नमाज पढ़ी और उसके बाद जुरैज ने उस लड़के से कहा "ऐ लड़के बता तेरा बाप कौन है।"

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने उस लड़के को ज़ुबान दी और उसने कहा के “मेरा बाप! वो चरवाहा है।”

उस नन्हे बच्चे के बोल सुनकर लोगो को बड़ी नदामत हुई, उस चारवाहे को सज़ा दी गई और लोगो ने कहा के "ऐ जुरैज! चाहो तौ तुम्हारा गिरजा हम वापस बना देते हैं वो भी सोने का।"

जुरैज़ ने कहा के “नहीं! सोने का नहीं! मुझे जैसा था वैसा ही बनाकर दे दो।”

📕 सहिह अल-बुखारी 1206, 📕 सहिह अल-बुखारी 2483, 📕 सहीह मुस्लिम, 2550

सबक:

1) इस वाकिये में सबसे पहला सबक ये मिलता है के “एक वली के हक में भी माँ अगर बद्दुआ कर दे तो अल्लाह कबूल कर लेता है। इसलिए क्योंकि अल्लाह के पास इनका बहुत ऊंचा मुकाम है। ये दुआ दे तो क़बूल, बददुआ दे तो क़बूल, चाहे आपकी शख़्सियत कुछ भी रहे। सुभानअल्लाह!!!

2) दूसरा सबक ये पता चलता है 'एक मामूली सी लरजिश जो जुरैज से हुई उसका इतना अज़ीम नुक्सान उन्हें हुआ के अल्लाह रब्बुल इज्जत ने इतनी बड़ी आजमाइश में डाल दिया जुरैज को।

ये उनकी बिल्कुल भी मामुली सी गलती थी, अल्लाह रहम करे ऐसी गलती तू आज हम में से कौन नहीं करता? हमारे वालिदैन हज़ार मरतबा आवाज़ देते हैं लेकिन फिर भी हम उन्हें नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। अल्लाह मुअफ़ करे हमें।

3) इस वाकिये से तिसरा और अहम सबक जो हमें मिलता है वो ये है "नफील इबादत पर वालीदैन की खिदमत को तर्जी देना चाहिए।"

इन शा अल्लाह-उल-अज़ीज़! अल्लाह तआला हमें अपने वालीदीन का फरमाबरदार बनायें, हमें कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक अता फरमाये. आमीन! अल्लाहुम्मा अमीन।

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रिश्तेदारों के हुकूक : कुरआन हदीस की रौशनी में | Rishtedaro ke Huqooq Quran Hadees ki roshni mein

रिश्तेदारों के हुकूक अदा करने का हुक्म:

क़ुरआन: “बेशक! अल्लाह तआला इंसाफ का और अहसान करने का और रिश्तेदारों को उनके हुकुक देने का हुक्म देता है” 1

हदीस : रसूलल्लाह ﷺ ने फ़रमाया : जो शख्स रिश्तेदारों का हक अदा करने के लिए सदके का दरवाज़ा खोलता है तो अल्लाह तआला उस की दौलत को बढ़ा देता है। 2

हदीस : सबसे अफजल सदका वो है जो ऐसे रिश्तेदार पर किया जाए जिसने दिल में दुश्मनी छुपा रखी हो। 3

हदीस : रसूलअल्लाह (ﷺ) ने फरमाया : "जो ये चाहे कि उसकी रोज़ी बढ़ जाए और उसकी उमर लंबी हो जाए, उसे चाहिए कि सिला रहमी (रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक) करे।” 4

हदीस : रसूलअल्लाह (ﷺ) ने फरमाया : "अल्लाह से डरते रहो और अपने रिश्तेदारों के साथ हुस्ने सुलूक करो5


रिश्तेदाओं से सिला रेहमी की अहमियत:

हदीस : रसूलअल्लाह (ﷺ) ने फरमाया : “अपने हसब व नसब को सीखो (रिश्तेदारों को जानो) ताके तुम उन के साथ सिला रहमी कर सको, इस लिये के सिला रहमी करने से रिश्तेदारों में मुहब्बत, माल मे वुस्अत (ज्यादती) और उम्र में बरकत होती है।” 6

बुरे रिश्तेदार से सिला रेहमी करने का सवाब:

हदीस : एक शख़्स ने अर्ज़ किया “या रसूलअल्लाह (ﷺ)! मेरे बाज़ रिश्तेदार है, मैं उनसे तालुक जोड़ता हूं वो मुझसे ताल्लुक तोड़ते हैं, मैं उनके साथ अच्छा सुलूक करता हूं, वो मेरे साथ बदसलूकी करते है। और मैं उनकी जियादतियों को बर्दाश्त करता हूं, वो मेरे साथ जहालत से पेश आते हैं।”

रसूलअल्लाह (ﷺ) ने इरशाद फरमाया "जैसा तुम कह रहे हो अगर ऐसा ही है, तो गोया तुम उनके मुंह में गरम गरम राख झोंक रहे हो, और जब तक तुम इस खूबी पर कायम रहोगे तुम्हारे साथ हर वक्त अल्लाह ताला की तरफ से एक मददगार रहेगा।” 7


रिश्तेदारी तोड़ने का गुनाह:

हदीस : रसूलल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “कता रहमी करनेवाला (यानी रिश्ते तोड़ने वाला) जन्नत में नहीं जायेगा।” 8


रिश्तेदारों पर खर्च न करने की सजा:

हदीस : “कोई भी रिश्तेदार अपने किसी रिश्तेदार के पास आता है और अल्लाह सुब्हानहु ने उसे जो अता किया है उसमें से फ़ज़्ल (जो चीज जरूरी से ज्यादा हो) का सवाल करता है और वह बुखल (बुरे अखलाख / कंजूसी) से पेश आता है तो कयामत के दिन उसके लिए दोज़ख से एक सांप निकाला जाएगा जिसको शुजा कहा जाता है ,वो फुंकार रहा होगा उससे उसके गर्दन में तौक बना कर डाल दिया जाएगा।'' 9


रिश्तेदारों में भी इंसाफ से काम लेने की तरबियत:

क़ुरआन: अल्लाह ताला कुरान में फरमाता है: ‟जब कोई बात कहो तो इन्साफ से काम लो, चाहे मुआमला अपने करीबी रिश्तेदार ही का हो।" 10

मसलन जब भी कोई मामला पेश आये तो इंसाफ से काम लो, चाहे वो रिश्तेदारों के हक़ में हो या खिलाफ हो। यानि किसी रिश्तेदार की मोहब्बत तुम्हे नाइंसाफी करने पर मजबूर न कर दे।


हवाला (Reference) :

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